My Name on Mars

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समाचार विज्ञान और प्रोद्यौगिकी के 

1.  आ गया ज़माना निजी अंतरिक्ष यान का
बहुत ही जल्द, आ के तुझे तारों की दुनिया के सैर करा दूं वाली फ़िल्मी कहानी हकीकत बनने वाली है, अंतरिक्ष का सफर आम आदमी के लिए जल्द ही हकीकत में बदलने जा रहा है। अब तक सिर्फ अंतरिक्षयात्री ही विशेष अभियान और प्रशिक्षण के बाद चांद सहित अंतरिक्ष में जाते थे। अब रूसी और अमेरिकी सरकारी अंतरिक्ष एजेंसियों के अलावा निजी कंपनियां भी अंतरिक्ष के क्षेत्र में कदम रख रही हैं। 22 मई को अमेरिका के कैलिफोर्निया की एक निजी कंपनी जिसका नाम स्पेस-एक्स है, का मानवरहित यान अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए भेजा गया। आज तक की दुनिया की किसी निजी कंपनी की अंतरिक्ष में यह पहली उड़ान है। निजी कंपनी स्पेस-एक्स ने ड्रैगन नामक मानवरहित यान को अंतरिक्ष स्टेशन भेजा है। ड्रैगन को अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन तक  पहुंचने में दो दिनों का समय लगा।
गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहे कईं सरकारी स्पेस कार्यक्रम अब इन निजी कम्पनियों के मदद ले सकेंगी। इससे अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर हो रहे भारी खर्च में कमी आयेगी और इस धन को मंगल ग्रह अन्वेषण और अन्य शोध कार्यों में लगाया जा सकता है स्पेस एक्स, ऑरबाइटल साइंसेज कॉर्प निजी कम्पनियां नासा और अन्य अंतरिक्ष एजेंसियों के लिए काम कर रही हैं। ड्रेगन के बाद अब दूसरी निजी कंपनी इसी साल में अपने ऐन्टारेस रॉकेट से साइग्नस नामक अंतरिक्ष यान को अंतरिक्ष स्टेशन भेजने की तैयारी कर रही है। निजी कम्पनियों के निरंतर प्रयासों से अब वह दिन ज्यादा दूर नहीं है कि आम आदमी भी भारी धन राशि खर्च करके अपनी महबूबा के लिए चाँद तारे तोड़ के ना सही पर उसको अंतरिक्ष की सैर करवा के ला सकता है।

2.  नेत्रहीन व्यक्तियों का पढ़ पाना अब सम्भव संवेदक प्रतिस्थापन डिवाइस से
येरुशलम के हिब्रयू विश्वविद्यालय ने एक ऐसी डिवाइस विकसित की है, जो कि नेत्रहीनों को  देखना संभव करा सकती है। इस का नाम है संवेदक प्रतिस्थापन डिवाइस (एसएसडी),इस डिवाइस से नेत्रहीन व्यक्ति अब छोटे छोटे अक्षरों को पढ़ पायेगा। पहले यह आंखों के प्रत्यर्पण से यह संभव हो सकता था। दुनिया में नेत्रहीन लोगों की काफी अधिक आबादी है और सभी के लिए आंखों का प्रत्यर्पण संभव नहीं है। अब उन्हें हताश या निराश होने की जरूरत नहीं है। नेत्रहीन व्यक्तियों के लिए सबसे खुशी की बात क्या हो सकती है, कि अब वो भी आम आदमियों की तरह से पढलिख पायेंगे। इसके लिए नेत्रहीनों को प्रशिक्षण भी दिया जाता है। येरुशलम के हिब्रयू विश्वविद्यालय में आठ नेत्रहीन व्यक्तियों पर इस डिवाइस की प्रायोगिक जांच की गयी और वे सभी विश्व  स्वास्थ्य संगठन द्वारा नेत्रहीनता के निर्धारित मानक से छोटे अक्षर को पढ़ पाने में सफल रहे। इसके लिए स्नेलन जांच की मदद ली गयी। यह ऐसी जांच है, जिसका इस्तेमाल चिकित्सक नेत्र जांच में करते हैं। इसमें अलग-अलग दिशाओं और आकार में लिखे अक्षरों को पढ.ने के लिए कहा जाता है। येरुशलम के हिब्रयू विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों का कहना है कि यह डिवाइस छोटे अक्षरों को साउंड स्केप्स में बदल देता है। इस प्रक्रिया में कलन गणित (अल्गेरिद्म) की मदद ली जाती है। यह डिवाइस उपयोगकर्ता को अक्षरों को सुनने और उसे दृश्य सूचना में व्याख्या करने में मदद करता है।


3. सूर्य अपने 11-वर्षीय चक्र के उत्कर्ष पर
समय समय पर कुछ शरारती तत्व वैश्विक स्तर पर यह अफवाह उड़ाने में सफल हो जाते हैं कि अमुक तारीख या वर्ष को पृथ्वी पर प्रलय या महाप्रलय आयेगी ऐसी ही एक अफवाह  मैक्सिको और दक्षिण अमेरिका की प्राचीन माया सभ्यता द्वारा अपनाया गया कैलेंडर 5126 वर्ष लम्बा युग पूरा करने के बाद 21 दिसम्बर, 2012 को समाप्त होने पर की जा रही है इस तारीख को पृथ्वी के लिए अशुभ संकेत माना जा रहा है और उन्होंने पृथ्वी पर महाविनाश की तरह-तरह की भविष्यवाणियां भी की हैं। उनके अनुसार विश्वयुद्ध, परमाणु युद्ध, भूकम्प या अन्य कोई प्राकृतिक आपदा के बस का तो नहीं है कि वो अकेले पृथ्वी पर प्रलय ला दे तो ऐसे में ये किसी खगोलीय दुर्घटना का अनुमानित जिक्र करते है कि जो पृथ्वी पर कहर ढा सकती है। ऐसे में सूर्य की गतिविधियों और किसी खगोलीय पिंड के पृथ्वी से टकराने को अनुमानित तिथियों से जोड़ कर भय का वातावरण तैयार करते है। यह कहा जा रहा है कि सूरज की एक विशाल ज्वाला अगले वर्ष पृथ्वी को तबाह कर देगी। सूरज पर प्रचंड चुंबकीय ऊर्जा के आकस्मिक विस्फोट को सौर ज्वाला कहा जाता है।
नासा के अधिकारियों ने प्रलय की भविष्यवाणियों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। उनका कहना है कि सूरज इतनी शक्तिशाली लपट छोड़ने में समर्थ नहीं है कि पूरी पृथ्वी ही उसमें भस्म हो जाए। यह सही है कि सूरज अपने 11-वर्षीय चक्र के उत्कर्ष पर पहुंच रहा है, लेकिन यह उत्कर्ष अगले साल नहीं, 2013 या 2014 में आएगा। पहले भी सूरज की चरम गतिविधियों के बहुत से दौर आ चुके हैं, लेकिन हम सब और हमारी पृथ्वी सही सलामत है। असली मुद्दा यह है कि क्या सूरज की विनाशकारी ऊष्मा धरती तक पहुंच सकती है?
सूरज पर होने वाली उथल-पुथल से पृथ्वी पर असर जरूर पड़ता है। सौर लपटें पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल को अस्थायी तौर पर प्रभावित कर सकती हैं। इससे उपग्रह संचार प्रणाली को खराब कर सकती है। सौर ऊर्जा कणों का तूफान इससे भी ज्यादा मुसीबत खड़ी कर सकता है। पृथ्वी पर प्रहार करने वाले सौर ऊर्जा कण विद्युत ग्रिड, जीपीएस सिग्नल और रेडियो संचार को छिन्न-भिन्न कर सकते हैं। ऊर्जा कणों का बहुत ही शक्तिशाली तूफान टेक्नोलॉजी पर निर्भर हमारे समाज को काफी नुकसान पहुंचा सकता है, लेकिन इससे हमारी पृथ्वी या मानव जाति का सफाया नहीं हो सकता। कुछ लोग प्रलयदूत के रूप में प्लेनेट-एक्स या नाइबीरू का भी नाम ले रहे हैं। उनका कहना है कि पृथ्वी से चार गुना बड़ा यह आवारा खगोलीय पिंड अगले साल हमारी पृथ्वी से टकरा कर समस्त जीवन का सफाया कर देगा। आखिर यह नाइबीरू है कहां। विशेषज्ञों का कहना है कि यह ग्रह सिर्फ कुछ लोगों की कल्पना में बसता है। इसका कोई अस्तित्व नहीं है। नासा के अधिकारियों  का कहना है कि नाइबीरू का कोई प्रमाण नहीं है, न तो कोई प्लेनेट-एक्स है और न ही कोई वस्तु हमारी तरफ आ रही है। नाइबीरू का विचार सबसे पहले अमेरिका में रहने वाली एक महिला नेंसी लाइडर ने रखा था। वह दावा करती हैं कि जेटा नाम के दूसरे ग्रह के जीवों ने बचपन में उससे संपर्क किया था और उन्होंने उसके दिमाग में एक ऐसा संचार का इलेक्ट्रोनिक  उपकरण फिट किया था। उसका यह भी दावा है कि इस उपकरण के जरिये वह दूसरे ग्रह के जीवों के सम्पर्क में रहती है। 1995 में लाइडर ने अपने विचारों को प्रचारित करने के लिए जेटाटाक के नाम से एक वेबसाइट भी बनाई  थी। हमे इन प्रलय की भविष्यवाणियों को पूरी तरह से खारिज कर देना चाहिए और अपना जीवन निर्वाह इमानदारी से करते रहना चाहिए।

4. अमरुद की बादशाहत कायम 
अक्सर पेट दर्द और जुकाम खॉसी का जिम्मेदार माना जाने वाला फल अमरुद अब अपने Antioxidants की बदौलत सुपर फूड्स की श्रेणी  में आ गया है। जी हाँ  अमरुद हमारे देश  में पाये जाने वाले फलों में सबसे ज्यादा गुणकारी माना गया है क्योंकि इसमें पाये जाने वाले Antioxidants  कैंसर जैसी गम्भीर बिमारियों से बचा सकते हैं।
राष्ट्रीय पोषण  विज्ञान संस्थान हैदराबाद के अनुसंधान कर्ता डॉ श्रीरामुल्लु ने भारतीय दैनिक आहार के 14 विभिन्न पदार्थो का Antioxidants के लिये विश्लेषण किया। इनमे फल सब्जियॉ मेवे और दालें शामिल थी। अनुसंधानकर्ताओें ने हैदराबाद की विभिन्न मंडियों से अपने सैम्पल इक्ठठे कर पूरे 4 सालों तक ये विश्लेषण  किया जिसके आधार पर अमरुद सर्वोच्च रहा। इस विश्लेषण से अनंसंधानकर्ता भी हैरान हुए बिना नहीं रह पाये।
अमरुद के बाद आम, सेब और शरिफा Antioxidants में अच्छे पाये गये जबकि अनानास, चीकू तरबूज़ और केले में Antioxidants की  मात्रा काफी कम पायी गयी।
ये अपने तरह का पहला अध्ययन है जिससे ये ज्ञात हुआ कि हमारे देश में आम मिलने वाला ये सस्ता सा फल हमें खतरनाक बिमारियों से बचा सकता हैं। अमरुद में पाये जाने वाले Antioxidants  कैंसर जैसी गम्भीर बिमारियों से हमें बचा सकते हैं।
अन्य खाद्य पदार्थों में भिंडी, राजमा, कड़ीपत्ता, पुदिना, रागी,  किशमिश  और अखरोट में भी अच्छी मात्रा में Antioxidants पाये गये।

5. बॉडी क्लाक या जैविक घड़ी नियंत्रित करता है प्रतिरक्षा नियंत्रण की कमी और अधिकता 
यह नया अध्ययन महत्वपूर्ण जैविक क्रिया को बताता है जिसे मेडिकल की भाषा में 'शरीर घडी' या 'जैवलय' 'जैविक घड़ी' कहते हैं। अंग्रेजी में इसे 'Body Clock' 'Circadian Rhythms' 'Biological Rhythms' या 'Biological Clock' कहा जाता है। हमारा शरीर जैवलय के अनुरूप कार्य करता है जिसमे रात्री 2बजे हम गहरी नींद में होते हैं प्रातः 4.30 बजे हमारे शरीर का तापमान न्यूनतम होता है 6.45 प्रातः रक्तचाप बढोतरी शुरू होती है फिर हारमोन स्रावण शिथिल, 10 बजे प्रातः हमारा शरीर उच्च सतर्कता स्तर पर होता है और बाद दोपहर तीव्र समन्वयन क्षमता पर होता है। 3.30 बजे दिन में तीव्र प्रतिक्रिया समय होता है। उसके बाद 5 बजे उच्च दक्षता युक्त ह्रदय कार्य क्षमता और मांसपेशीय मजबूती होती है तत्पश्चात 6.30 सायं उच्च रक्तचाप सीमा व 7 सायंकाल उच्च शारीरिक तापमान स्तिथि होती है। 9 रात्री हारमोन स्रावण अधिक और आंतीय हलचल धीमी होनी शुरू हो जाती है। इस 24 घंटे की जैविक प्रक्रिया को  'जैवलय' या 'जैविक घड़ी' कहते हैं। एक नए अध्ययन से पता चला है कि हमारी शारीरिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया की उच्च और निम्न स्तिथि इसी  'जैवलय' या 'जैविक घड़ी' पर बहुत निर्भर करती है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यदि हम कम नींद लेते हैं तो हमारी  'जैवलय' प्रभावित होती है साथ साथ हमारी शारीरिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया भी प्रभावित होती है।
इस अध्ययन से कमजोर प्रतिरक्षा वाले रोगियों के लिए बेहतर ढंग से उपचारात्मक रणनीति बनाई जा सकेगी।
24 घंटे के दैनिक चक्र 'सिकेडीयन क्लाक' के रूप में जाना जाता है येल विश्वविद्यालय के स्कूल आफ मेडिसिन के वरिष्ठ लेखक ऑथर डा. इरोल फाईक्रिग के अनुसार " नींद के आभाव में हमारी दैनिक लय बिगड़ने से हमारी शारीरिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया प्रभावित होती है"
अपने अध्ययन में शोधदल के सदस्यों की रूचि 'सिकेडीयन नियंत्रण' के अंतर्गत प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा रोगजनक कारक और बावक्त प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का पता लगाने में थी। डा. फाईक्रिग और सहयोगियों ने क्षतिकारक रिसेप्टर- 9 (TLR9) की कार्य प्रणाली को समझा और पाया कि यह प्रतिरक्षा प्रोटीन जीवाणु और विषाणु DNA को पहचानता है जब शोधकर्ताओं ने चूहों का प्रतिरक्षण TLR9 से किया तो उनमे  'सिकेडीयन क्लाक' 'जैवलय' नियंत्रित हुई और पाया कि TLR9 शारीरिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को बढाने का एक महत्वपूर्ण नमूना साबित हुआ। रोगग्रस्त मनुष्य में रात्री 2 से 6 बजे के बीच जान का खतरा अधिकतम होता है यह निष्कर्ष स्पष्ट करते हैं कि हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली और  'सिकेडीयन क्लाक' 'जैवलय'  के बीच सीधे आणविक लिंक हैं।
 डा. इरोल फाईक्रिग ने और कहा कि गहन चिकित्सा कक्ष में रोगियों को अक्सर निद्रा गडबडी कम या ज्यादा,शोर,प्रकाश व दवाओं के प्रयोग से बहुत परेशानी होती है अत् अब यह बहुत जरूरी हो जाता है कि कैसे TLR9 इन कारकों को भी प्रभावित करेगा।

6. अरहर की दाल के जीनोम को डीकोड किया राज खुले 
अरहर की दाल भारत के बहुत से राज्यों में बड़े ही चाव से खाई जाती है दुनिया भर में इसका 85 उत्पादन व खपत भारत में ही है। भारतीय कृषि वैज्ञानिकों  ने अरहर का उत्पादन बढ़ाने की दिशा में एक बड़ी सफलता हासिल की है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्  (ICAR) के कुछ प्रमुख संस्थानों, कृषि विश्व विद्यालयो और बनारस हिंदू विष्वविद्यालय के कृषि वैज्ञानिकों के एक दल ने आई सी ए आर के दिल्ली स्थित राष्ट्रीय जैव प्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र  के वैज्ञानिक डॉ. नगेन्द्र  कुमार सिंह के नेतृत्व में  अरहर के जीनोम को  डीकोड कर लिया है। यह किसी पौधे का ऐसा पहला जीनोम है जिसे भारतीय अनुसंधान संस्थाओं ने बिना किसी बाहरी सहयोग के अपने ही स्तर पर डीकोड किया है। इन वैज्ञानिकों ने डीकोड करने के  लिए अरहर की प्रचलित किस्म ‘आशा’  का जीनोम चुना और जीन अनुक्रमण यानी जीवसीक्वेंसिंग की विशेष तकनीक से इसके 51 करोड़ 10 लाख बेस पेयरों (Base Pairs) का पता लगाया। अरहर के जीनोम में उन्होंने 47004 प्रोटीन कोडिंग जीन पहचाने जिनमें से 1,213 जीन रोगरोधिता के और 152 जीन सूखा, गर्मी और लवणीयता (Salinity) को सहन करने से संबंधित थे। अरहर के जीनोम सीक्वेंस का उपयोग बड़ी संख्या में इस फसल के डी एन ए मार्कर विकसित करने में किया गया जिनसे अरहर की किस्मों में विविधता का पता लगाया जाएगा। इन मार्करों से अरहर के आणविक स्तर पर प्रजनन में भी मदद मिलेगी।
अरहर हमारे देश में दाल की एक प्रमुख फसल है। विश्व में अरहर का 85 प्रतिशत उत्पादन और उपभोग भारत में  ही होता है। नए अनुसंधान से  इसके जीनोम की संरचना का पता लग जाने के बाद अब अरहर की अधिक उपज देने वाली रोग प्रतिरोधी और सूखा सहने  में  अधिक समर्थ  किस्मों का विकास किया जा सकेगा।

8. टमाटर के जीन भी हुए डीकोड 
टमाटर के बारे में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जुटे वैज्ञानिकों बहुत बड़ी सफलता हाथ लगी है वे टमाटर के सम्पूर्ण जीन-समूह यानि कि जीनोम को पढ़ने में सफल हुए हैं और साथ ही जीनों को क्रमबद्ध व्यवस्थित करने में भी कामयाब हुए हैं इसका सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि टमाटर में अब पोष्टिकता, रंग, स्वाद, में सुधार किया जा सकेगा और यहाँ तक कि टमाटर में रोगों से लड़ने की क्षमता भी विकसित हो सकेगी।
इन वैज्ञानिकों ने जंगली टमाटरों के जीनों को भी तुलनात्मक अध्ययन के लिए क्रमबद्ध किया है टमाटरों के इस शोध कार्य में आठ देशों के वैज्ञानिकों को नौं वर्ष लगे। इस आशय से समन्धित शोध लेख नेचर पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। भारत, स्पेन, जर्मनी, फ्रांस, इटली, ब्रिटेन, बेल्जियम, यू एस ए देशों के वैज्ञानिकों ने अथक परिश्रम से ये कारे सम्पन्न किया। शोधकर्ताओं ने बताया कि टमाटर में लगभग 35 हजार जीन होते हैं जो कि 12 गुणसूत्रों पर लयबद्ध जुड़े होते हैं इन जीनों के अध्ययन से यह पता चल सकता है कि टमाटर का क्रमिक विकास कैसा रहा होगा कैसे यह एक जंगली पौधे से विकसित हो कर इतना गुणवान और स्वादिष्ट हुआ। जीनोम से मिली जानकारियों का प्रयोग कर के वैज्ञानिक भविष्य में टमाटर में सेव , स्ट्राबेरी और अन्य गुद्देदार फलों की किस्मे भी सुधार सकते हैं।

9. यूरोपा पर भी जीवन की आशा जगी
आजकल वैज्ञानिक अपने सौरमंडल के अलावा अन्य ग्रहों व उन के उपग्रहों पर जीवन की तलाश में जुटे हैं। मंगल पर अपने उत्साही प्रयासों के बाद अब वैज्ञानिकों के हाथ एक सुराग लगा है। जिस से पता चलता है कि बृहस्पति के चंद्रमा (उपग्रह) ‘यूरोपा’ की बर्फीली सतहों के नीचे पानी है। नासा के एक अंतरिक्ष यान गैलीलियो को ये सुराग मिले हैं गैलीलियो द्वारा लगातार भेजे जा रहे आंकड़ों से इस बात की पुष्टी हो रही है कि वहाँ जल है। यदि ऐसा है तो यूरोपा पर जीवन की उपस्तिथि के चांस बढ़ते हैं अर्थात वहाँ पर जीवन के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ मौजूद हैं।  बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा का आकार पृथ्वी के चंद्रमा थोड़ा छोटा है। प्राप्त आंकड़ों से सपष्ट हो रहा है कि बर्फ के नीचे मौजूद सागरों में लगातार रासायनिक परिवर्तन हो रहें हैं  जो कि जीवन की उत्पत्ति के लिए सहायक हैं।

10.  भारतीय छात्रा ने आईक्यू में आइंस्टाइन को भी पीछे छोड़ा 
भारतीय मूल की फैबिओला मान की उम्र महज 15 साल है, लेकिन उनका आईक्यू अल्बर्ट आइंस्टाइन और स्टीफन हॉकिंग से भी ज्यादा है। यकीन नहीं हो रहा! मूल रूप से गोवा की रहने वाली लंदन निवासी फैबिओला मान ने दुनिया की सबसे पुरानी और बड़ी हाई आईक्यू सोसायटी मेंसा आईक्यू टेस्ट में 162 पॉइंट्स हासिल कर अपनी इंटेलिजेंस का लोहा मनवा लिया।
इस आईक्यू के साथ फैबिओला का नाम दुनिया के टॉप 1 पर्सेंट इंटेलिजेंट लोगों की लिस्ट में शुमार हो गया है। फैबिओला का स्कोर बड़े-बड़े साइंटिस्ट्स से भी 2 पॉइंट्स आगे है। मेंसा सोसायटी की स्थापना 1946 में हुई थी। मेंसा ने इसी साल अगस्त में फैबिओला को मेंबरशिप दी थी। दिलचस्प बात यह है कि फैबिओला खुद इस स्कोर की उम्मीद नहीं कर रही थीं।
एक ई-मेल के जरिए फैबिओला ने बताया, 'मैंने मेंसा के बारे में सुना था सो मैंने टेस्ट देने के बारे में सोचा।' उन्होंने बताया कि वह पहेलियों में हमेशा से दिलचस्पी रखती थीं, इसलिए उन्होंने अप्लाई किया और अपने पैरंट्स को टेस्ट की फीस देने के लिए राजी कर लिया।
30 जुलाई को लंदन यूसीएल मेडिकल कॉलेज में तीन घंटे का टेस्ट आयोजित किया गया था। फैबिओला के मुताबिक, 'सवाल काफी कन्फ्यूजिंग थे और उनके जवाब देने का टाइम भी बहुत कम था। इसलिए मैं समझ नहीं पा रही थी कि मैंने कैसा टेस्ट दिया।'
फैबिओला की मां रेने अपनी बेटी के आईक्यू पर खासा गर्व महसूस कर रही हैं। उन्होंने कहा, 'मैंने मेंसा और बच्चों के आईक्यू लेवल के बारे में सुना था, अब मैं काफी खुश हूं कि मेरी बेटी भी टॉप आईक्यू बच्चों में से एक है।

11. पृथ्वी जैसे नए ग्रह की खोज 
इस ब्रह्माण्ड में जीवन के लिए सिर्फ हमारी पृथ्वी ही नहीं है बल्कि अब एक पृथ्वी जैसे नए ग्रह की खोज कर ली गई है जहां पर जीवन संभव हो सकता है । अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा के केप्लर मिशन ने एक ऐसे ग्रह का पता लगाया है जो गुणों में पृथ्वी से मिलता-जुलता है। यहां जमीन है और शायद पानी भी। इस ग्रह की परिस्थितियां जीवन के अनुकूल हैं और खास बात यह है कि यह ग्रह अपने सूरज जैसे तारे के जीवन -अनुकूल क्षेत्र में ही चक्कर काट रहा है। खगोल वैज्ञानिकों ने वैसे तो हमारे सौरमंडल से बाहर अनेक नए ग्रहों का पता लगाया है और इनमे से कुछ ग्रहों को संभावित पृथ्वी के रूप में भी देखा गया है, लेकिन यह पहला मौका है जब किसी ग्रह में पृथ्वी जैसे गुण देखे गए हैं।
पिछले दिनों  अमेरिका की अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने सौरमंडल से बाहर पृथ्वी के समान और संभावित जीवन के लिए अनुकूल वातावरण वाले केपलर 22बी नामक नए ग्रह की खोज की। नासा के खगोल वैज्ञानिकों की टीम के अनुसार केपलर 22बी नामक इस नए ग्रह पर भविष्य में मानव का संभावित बसेरा हो सकता है । केप्लर 22बी ग्रह जिस तारे का चक्कर काट रहा है उसका नाम जी5 रखा गया है। यह लाइरा और साइग्नस तारामंडल में मौजूद है और पृथ्वी से लगभग 600 प्रकाश वर्ष दूर अपने सितारे के चारों ओर घूर्णन कर रहा केपलर 22बी हमारे ग्रह से 2 गुना 4 बड़ा है जिसके कारण इसे उन ग्रहों की श्रेणी में रखा गया है, जिन्हें सुपर-अर्थ कहा जाता है। यह ग्रह अपने सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने में 290 दिन का समय लेता है। अनुमान लगाया गया है कि सतह के निकट इस ग्रह का तापमान 72 डिग्री या 22 सेल्सियस होगा। हालांकि वैज्ञानिकों को यह जानकारी नहीं है कि यह ग्रह चटटानों से भरा है या यह गैस अथवा तरल अवस्था में है।. इस तारे का द्रव्यमान और अर्द्ध व्यास हमारे सूरज से कुछ कम है। इसकी वजह से इसकी चमक सूरज से 25 प्रतिशत कम है
जीवन की संभावना वाले पृथ्वी जैसे ग्रहों की खोज में एक कदम और आगे बढ़ते हुए नासा ने कहा है कि केपलर अंतरिक्ष दूरबीन ने हमारे सौर तंत्र से बाहर एक ऐसे ग्रह की मौजूदगी की पहली बार पुष्टि की है जिस पर जीवन हो सकता है।

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