My Name on Mars

कुछ लेख


1. विज्ञान के क्षेत्र में दुनिया की दस बड़ी खोजें

विज्ञान के क्षेत्र में इन दस  बड़ी खोजों ने सम्पूर्ण मानवता की दशा और दिशा बदल दी.इन १० बड़ी खोजों के बल पर ही आज हम आधुनिक युग का सपना सच कर पा है इस पर एक विशेष प्रस्तुति 

1 पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाती है 

आ रंभ में ऐसा माना जाता था कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाती है. लेकिन, करीब चार सौ साल पहले गैलीलियो ने सिद्धांत दिया कि सूर्य नहीं, हमारी पृथ्वी ही सूर्य का चक्कर लगाती है. जब गैलीलियो ने यह सिद्धांत दिया तो ईसाइयों की धार्मिक संस्था वेटिकन ने इस पर कड़ा ऐतराज जताया था. वेटिकन का कहना था कि गैलिलियो ने अपने इस सिद्धांत के जरिए धार्मिक ज्ञान को झुठलाने की कोशिश की है. इस कारण चर्च द्वारा गैलीलियो को सजा भी दी गयी. 

बाद में, चर्च के दबाव में आकर गैलीलियो ने अपना यह सिद्धांत वापस ले लिया था कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर काटती है. गौरतलब है कि वर्ष 1564 में रोम के पीसा शहर में जन्मे गैलीलियो ने 1609 में टेलीस्कोप का आविष्कार किया, जिसके जरिये दूर की वस्तुओं को देखना संभव हो गया था. गैलीलियो ने टेलीस्कोप के जरिए आकाश में नजर आने वाले चांद-तारों और अन्य ग्रहों को परखने की कोशिश की. इस व्यापक अध्ययन के आधार पर उन्होंने ‘डायलॉग कंसर्निंग द टू चीफ सिस्टम्स’ में अपना सिद्धांत पेश किया कि पृथ्वी, सूर्य का चक्कर लगाती है. 

गैलीलियो का यह सिद्धांत पोप अर्बन अष्टम को नागवार गुजरा और उन्होंने वर्ष 1633 में गैलीलियो के खिलाफ मान्य धार्मिक परंपराओं के खिलाफ सिद्धांत देने और पाखंड फैलाने के आरोप में मुकदमा चलाने के निर्देश दिये. मामले की जांच के दौरान गैलीलियो के सिद्धांत को धार्मिक ग्रंथों में बतलाए गये मतों के विपरीत बताते हुए दार्शनिक दृष्टिकोण से खारिज कर दिया गया. नतीजतन, चर्च की सजा से बचने के लिए अंतत: गैलीलियो ने अपना सिद्धांत वापस लेते हुए माफी भी मांगी. वर्ष 1642 में जब गैलीलियो की मौत हुई, उस समय तक वह अपने इस अपराध के बदले नजरबंद रहने की सजा काट रहे थे.

बाद में, वैटिकन को भी मानना पड़ा कि गैलीलियो का सिद्धांत बिल्कुल सही था. इस खोज के साथही अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में कई तरह के बदलाव आये. 

अभी तक यह मान्यता चली आ रही थी कि सोलर सिस्टम यानी सौर परिवार के केंद्र में पृथ्वी है और सूर्य सहित बाकी सभी ग्रह पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं, लेकिन बाद में यह गलत साबित हुआ और यह साबित हुआ कि पृथ्वी नहीं सूर्य हमारे सौर परिवार का केंद्र बिंदु है और पृथ्वी सहित बाकी ग्रह उसके चारों ओर चक्कर लगाते रहते हैं.

2 उत्प्लावन का सिद्धांत 

किसी तरल (द्रव या गैस) में आंशिक या पूर्ण रूप से डूबी किसी वस्तु पर ऊपर की ओर लगने वाला बल उत्प्लावन बल कहलाता है. उत्प्लावन बल नावों, जलयानों, गुब्बारों आदि के कार्य के लिये जिम्मेदार है. इस सिद्धांत का प्रतिपादन सबसे पहले आर्कमिडीज ने किया. जिसके अनुसार यदि कोई वस्तु किसी तरल में आंशिक या पूर्ण रूप से डूबी है तो उसके भार में कमी हो जाती है. भार में यह कमी, उस वस्तु द्वारा हटाये गये तरल पदार्थ के भार के बराबर होती है. अर्थात जब कोई वस्तु तरल पदार्थ पर तैरती है तो उस पर ऊपर की ओर लग रहा उत्प्लावन बल उस वस्तु द्वारा हटाये गये द्रव की मात्रा के बराबर होती है. आर्कमिडिज का यह सिद्घांत विज्ञान के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव का कारण बना. इससे वैज्ञानिकों को पता चल गया कि कोई वस्तु जल में क्यों तैरती है. इसके बाद ब.डे-ब.डे जहाजों का निर्माण किया जाने लगा. जिससे समुद्री यात्रा संभव हो सकी. जब भी कोई वस्तु द्रव में तैरती है, वस्तु का वजन नीचे की ओर बल लगाता है. वस्तु के द्वारा हटाया गया द्रव ऊपर की ओर. यदि इन दोनों बल की मात्रा बराबर होती है, तो वस्तु तैरने लगती है. अन्यथा वस्तु डूब जाती है.

इससे यह भी पता चला कि कौन सी वस्तु पानी पर तैरेगी और कौन सी डूब जायेगी यह उस वस्तु के घनत्व पर निर्भर करता है. किसी वस्तु की मात्रा और परिमाण के अनुपात को घनत्व कहते हैं. भौतिक शास्त्र के अनुसार यदि वस्तु का घनत्व पानी के घनत्व से कम होता है तो वह पानी में तैरती है और यदि उस वस्तु का घनत्व पानी के घनत्व से अधिक होता है तो वह पानी में डूब जाती है.
3 डीएनए-हेलिक्स की खोज

डीएनए की खोज की गिनती जीव विज्ञान की सबसे अद्भुत खोजों में से एक के तौर पर की जाती है. जीव विज्ञान की यह एक ऐसी खोज थी, जिसके जरिये विज्ञान के कई सिद्धांतों की पुष्टि तो हुई ही, साथ में मानवों के पूर्वजों के बारे में भी पता लगाने का काम आसान हो गया. डीएनए एक न्यूक्लिक एसिड(डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड) है. इसमें सभी जीवित प्राणियों के विकास आदि से संबंधित जेनिटक निर्देश समाहित होते हैं. डीएनए सेगमेंट में निहित इन जेनेटिक जानकारियों को जीन कहा जाता है. 

इसकी उपयोगिता की बात करें तो आपराधिक और आनुवंशिकी संबंधी मामलों को सुलझाने के लिए फॉरेंसिक वैज्ञानिक, खून, त्वचा या बालों आदि में पाए जाने वाले डीएनए की जांच करते हैं. इसके माध्यम से संबंधित व्यक्तियों के परिजनों से उनके डीएनए का मिलान किया जाता है. यह प्रक्रिया जेनेटिक फिंगर प्रिंटिंग या डीएनए प्रोफाइलिंग कहलाती है. डीएनए मैच करने की यह विधि एकदम सटीक और विश्वजसनीय होती है. हालांकि, कुछ मामलों में जहां डीएनए दूषित है वहां इसके परिणाम प्रभावित हो सकते हैं. डीएनए प्रोफाइलिंग की यह विधि 1984 में ब्रिटिश आनुवांशिक विज्ञानी सर एलेक जेफ्रेज ने विकसित की थी और 1988 में इसे पहली बार फॉरेंसिक विज्ञान में हत्या के मामले को सुलझाने में प्रयोग किया गया. 

सबसे पहले स्विस फिजिशयिन फ्रेडरिक ने 1869 में सजिर्कल बैंडेज पर लगे मवाद की माइक्रोस्कोपिक जांच के जरिए इसकी खोज की थी. मवाद में पाये गये अतिसूक्ष्म अणुओं को उन्होंने न्यूक्लिन का नाम दिया. 1919 में फोएबुस लेवेने ने इसके आधार पर शुगर और फॉस्फेट न्यूक्लिओटेड की पहचान की. अपराधों एवं पारिवारिक मामलों की जांच के लिए यह काफी महत्वपूर्ण है. आज इसका महत्व इतना बढ. गया है.

4 रेडियो तरंग की खोज

रेडियो तरंग एक प्रकार का इलेक्ट्रोमैग्नेटिक विकिरण है. इसके बारे में अनुमान पहली बार 1867 में जेम्स क्लर्क मैक्सवेल ने गणितीय गणना के दौरान लगाया. मैक्सवेल ने उस दौरान प्रकाश के तंरगदैध्र्य जैसे गुणों को देखा और इस आधार पर वह समीकरण दिया जिसके सहारे प्रकाश तरंगों और रेडियो तरंगों की व्याख्या की गयी. इसके बाद 1887 में हेनरिक हट्र्ज ने मैक्सवेल के इलेक्ट्रोमैग्नेटिक रेडियो तरंगो का प्रयोग अपनी प्रयोगशाला में किया. फिर कई प्रयोगों के बाद इसकी पुष्टि की गयी. आज इन रेडियो तरंगों का इस्तेमाल विभित्र क्षेत्रों में हो रहा है. उदाहरण के तौर रेडियो के एएम और एफएम स्टेशन. यानी सूचना प्रसारण के क्षेत्र में इसने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. हालांकि, इसका प्रयोग यहीं तक सीमित नहीं है. रेडियो फ्रीक्वेंसी ऊर्जा का इस्तेमाल चिकित्सकीय इलाज के लिए भी किया जाता है. पिछले 75 वर्षों से इसका इस्तेमाल इस क्षेत्र में हो रहा है. यह विशेष प्रकार की सर्जरी, शरीर में किसी द्रव के जमा हो जाने और अनिद्रा जैसी बीमारियों के इलाज में प्रयुक्त होती है. मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग यानी एमआरआइ के लिए भी रेडियो तरंगों का इस्तेमाल होता है, जिसके जरिये पूरे मानव शरीर की इमेज बनती है.

5 परमाणु ऊर्जा का सिद्धांत

परमाणु ऊर्जा वह ऊर्जा है, जिसे नियंत्रित परमाणु अभिक्रिया से उत्पत्र किया जाता है. आज बिजली उत्पादन के लिहाज से यह ऊर्जा काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है. परमाणु विखंडन के जरिए ऊर्जा प्राप्ति के लिए अर्नेस्ट रदरफोर्ड को इसका श्रेय दिया जाता है. वर्ष 1919 में उन्होंने परमाणु विखंडन का प्रयोग किया था. इस दौरान उन्होंने नाइट्रोजन पर रेडियोधर्मी पदार्थ से प्राकृतिक रूप से निकलने वाले अल्फा कण से बमबारी की और अल्फा कण से भी अधिक ऊर्जायुक्त एक प्रोटॉन को निकलते देखा. 1932 में उनके दो छात्र जॉन कॉक्रोफ्ट और अर्नेस्ट वाल्टन ने पूरी तरह कृत्रिम तरीके से परमाणु को विखंडित करने की कोशिश की. उन्होंने लिथियम पर प्रोटॉनों की बमबारी करने के लिए एक कण त्वरक का उपयोग किया, जिससे दो हीलियम नाभिक की उत्पत्ति हुई. 

जेम्स चैडविक द्वारा 1932 में न्यूट्रॉन की खोज के बाद, परमाणु विखंडन को पहली बार एनरिको फर्मी ने प्रयोगात्मक रूप से 1934 में रोम में हासिल किया. इसके लिए यूरेनियम पर न्यूट्रॉन से बमबारी की गयी. फिर, 1938 में ओट्टो हान और फ्रिट्ज स्ट्रॉसमन और भौतिकविद लिसे मेटनर और ओट्टो रॉबर्ट फ्रिश ने न्यूट्रॉन से पहली बार यूरेनियम पर प्रयोग किये. वैज्ञानिकों ने पाया कि अगर विखंडन की अभिक्रिया अतिरिक्त न्यूट्रॉन छोड़ती हैं, तो वे एक स्वचालित परमाणु श्रृंखला का निर्माण करती हैं. इस खोज के बाद परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आया. इस प्रयोग के तुरंत बाद अमेरिका में पहला परमाणु रिएक्टर बनाया गया. आगे चलकर इसी प्रयोग ने मानव को परमाणु बम बनाने के लिए प्रेरित किया. इन रिएक्टरों में नाभिकीय विखंडन से प्लूटोनियम पैदा करने के लिए प्रयोग किये गये. हालांकि, यह दीगर बात है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद इस प्रयोग के खतरे भी बढ.ने लगे. जापान पर परमाणु बम के इस्तेमाल के बाद इसके दुरुपयोग की बात सामने आयी. हालांकि, मानव कल्याण के लिहाज से भी यह कम महत्वपूर्ण नहीं है. 20 दिसंबर, 1951 को पहली बार एक परमाणु रिएक्टर द्वारा बिजली उत्पत्र की गयी. यह रिएक्टर अमेरिका ने स्थापित किया. अमेरिका के बाद जापान, रूस और र्जमनी जैसे देशों ने इस दिशा में कदम बढ.ाये. आज भारत सहित दुनिया के कई देश इस तरह की ऊर्जा के लिए कदम उठा रहे हैं.
     

6 डार्विन का विकासवाद और प्राकृतिक चयनवाद

मानव इतिहास की खोज में सबसे बड़ी खोज रही है, जीवों के विकास की कहानी. काफी समय तक यह सवाल अंधेरे में रहा कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत कैसे हुई और इसका विकास कैसे हुआ? इन्हीं सवालों का जवाब ब्रिटिश वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन ने लगभग 150 साल पहले अपने विकासवाद के सिद्धांत में दिया था. डार्विन ने ओरिजिन ऑफ स्पेसीज नामक पुस्तक में विकासवाद का सिद्धांत दिया. इसमें उन्होंने बताया कि पृथ्वी पर जीवन की शुरुआत एक सरल और सूक्ष्म एककोशीय भौतिक वस्तु (सेल या अमीबा) से हुई. यही एककोशीय वस्तु वक्त के साथ-साथ जटिल होते-होते विकसित हुई. इस विकास की प्रक्रिया में अस्तित्व के लिए संघर्ष चलता रहता है. इस संघर्ष में जो दुर्बल हैं, वे नष्ट हो जाते हैं, जो सक्षम हैं वे बच जाते हैं. इसे प्राकृतिक चयनवाद के सिद्धांत का नाम दिया गया. प्राकृतिक चयनवाद की इस प्रक्रिया में मानव का विकास बंदर या चिम्पाजी की प्रजाति से हुआ माना जाता है. 

प्राकृतिक चयनवाद से विभित्र प्रजातियों के रूपांतरण अथवा लुप्त होने में लाखों वर्षों का समय लगा होगा. डार्विन के इस सिद्धांत ने यूरोप के ईसाइयों की उस समय की आस्थाओं पर जबरदस्त प्रहार किया. इस तरह डार्विन ने पृथ्वी पर जीवों की उत्पत्ति और उनके विकास के रहस्य की गुत्थी सुलझाई थी.
७ आइजक न्यूटन का गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत

किसी वस्तु में दूसरे वस्तु को अपनी ओर खींचने की क्षमता को गुरुत्वाकर्षण कहते हैं. इसके बारे में पहली बार आइजक न्यूटन ने गणितीय सूत्र दिया था. गुरुत्वाकर्षण का महत्व इसी बात से है कि जितनी बार आप ऊपर की ओर छलांग लगाते हैं, गुरुत्वाकषर्ण का अनुभव करते हैं. यह आपको पृथ्वी की ओर खींचता है. अगर पृथ्वी में गुरुत्वाकषर्ण बल न हो तो कोई भी व्यक्ति, वस्तु या जीव इस पृथ्वी पर नहीं टिका रह सकेगा, सभी अंतरिक्ष में उड़ने लगेंगे. यानी दूसरे शब्दों में कहें, तो गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी पर हमारी मौजूदगी एवं भार को संतुलित बनाकर रखता है. सबसे बड़ी बात कि पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण कभी नहीं बदलता है, यदि इसमें बदलाव होने लगे तो इसका काफी व्यापक प्रभाव प.डेगा. लेकिन, इसका गुरुत्वाकषर्ण नहीं बदलता है. ऐसा इसके द्रव्यमान में बदलाव नहीं होने के कारण होता है. यदि द्रव्यमान में बदलाव हो तभी उसके गुरुत्वाकर्षण में बदलाव होगा. इस लिहाज से देखें तो न्यूटन ने पहली बार गुरुत्वाकषर्ण का सिद्धांत देकर यह साबित किया कि कोई भी वस्तु जो पृथ्वी पर टिकी रहती है, वह उसके गुरुत्वाकषर्ण बल के कारण ही होता है. इसके बाद सर आइजक न्यूटन ने अपनी मौलिक खोजों के आधार पर बताया कि केवल पृथ्वी ही नहीं, बल्कि विश्वे का प्रत्येक कण प्रत्येक दूसरे कण को अपनी ओर आकर्षित करता है और जिस वस्तु का द्रव्यमान अधिक होता है, उसी ओर कम द्रव्यमान वाला वस्तु खिंचा चला आता है.

8 सापेक्षता का सिद्धांत 

भौ तिक विज्ञान के क्षेत्र में सापेक्षता का सिद्धांत कई शोधों और सिद्धांतों का आधार है. अल्बर्ट आइंस्टीन ने इसे विकसित किया. इसके मुताबिक, ब्रह्मांड में किसी भी वस्तु की तरफ जो गुरुत्वाकर्षण खिंचाव आता है, उसकी वजह यह है कि हर वस्तु अपने मान और आकार के अनुसार अपने आसपास के स्पेस-टाइम में मरोड़ पैदा कर देती है. वर्षों के अध्ययन के बाद जब 1905 और फिर 1916 में आइंस्टीन ने इस सिद्धांत की घोषणा की, तो विज्ञान की दुनिया में तहलका मच गया और ढाई-सौ साल से कायम आइजक न्यूटन द्वारा घोषित ब्रह्मांड का नजरिया हमेशा के लिए उलट दिया गया. भौतिकी के क्षेत्र में इसका प्रभाव इतना गहरा पड़ा कि लोग आधुनिक भौतिकी को क्लासिकल फिजिक्स से अलग विषय बताने लगे और आइंस्टीन को आधुनिक भौतिकी का पिता माना जाने लगा. न्यूटन की क्लासिकल फिजिक्स में कहा जाता था कि ब्रह्मांड में हर जगह समय की रफ्तार एक ही है. अगर आप एक जगह टिक के बैठे हैं और आपका कोई मित्र प्रकाश से आधी गति की रफ्तार पर दस साल का सफर तय करे तो, उस सफर के बाद आपके भी दस साल गुजर चुके होंगे और आपके दोस्त के भी. लेकिन आइंस्टीन ने इसे गलत बताते हुए कहा कि जब कोई चीज गति से चलती है, उसके लिए समय धीरे हो जाता है और वह जितना तेज चलती है समय उतना ही धीरे हो जाता है. इसके अलावा न्यूटन का मानना था कि हर वस्तु में अपनी ओर खींचने की एक शक्ति होती है, जिसे गुरु त्वाकर्षण कहते हैं. 

पृथ्वी जैसी बड़ी चीज में यह बहुत अधिक होता है, जिससे हम पृथ्वी से चिपके रहते हैं. लेकिन गुरु त्वाकर्षण बल वास्तव में किस तरह काम करता है और क्यों करता है, यह न्यूटन नहीं बता पाये थे.
9 प्रकाश-संश्लेषण

वैन हेल्मॉन्ट ने 17वीं सदी की शुरुआत में प्रकाश संश्लेषण का सिद्धांत देकर यह साबित किया कि पौधों को पोषक तत्व सिर्फ मिट्टी से ही नहीं, बल्कि अन्य स्रोतों से भी प्राप्त होता है. इसके सौ वर्ष बाद स्टीवेन हेल्ज ने बताया कि पौधों के पोषणतत्व वायु से भी प्राप्त होते हैं. 1771-72 में ऑक्सीजन की खोज के बाद यह सिद्ध हुआ कि जीवित प्राणियों के लिए ऑक्सीजन बहुत जरूरी है. जीव ऑक्सीजन सांस द्वारा लेते हैं और कार्बन-डाइ-ऑक्साइड छोड़ते हैं. फिर, इंगेनहाउस ने यह साबित किया कि पौधे कार्बन डाइ ऑक्साइड का अवशोषण करते हैं और ऑक्सीजन को वायु में छोड़ते हैं. इस तरह पौधे जब मिट्टी से खनिज-लवण लेकर सूर्य के प्रकाशकी मौजूदगी में कार्बन-डाइऑक्साइड की मदद से अपना भोजन बनाते हैं, तो उसे प्रकाश-संश्लेषण कहते हैं. इस प्रक्रिया के दौरान पौधे आॉक्सीजन गैस वातावरण में छोड़ते हैं. यही वजह है कि ऑक्सीजन और कार्बन-डाइ-ऑक्साइड का संतुलन बना रहता है. 

साथही, क्लोरोफिल (वर्णहरित) और प्रकाश ऊर्जा की सहायता से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में विघटित होता है. यही हाइड्रोजन कार्बन डाइ ऑक्साइड का अपचयन करता है, जिससे पौधों में जटिल कार्बनिक पदाथरें का संश्लेषण होता है. गौरतलब है कि क्लोरोफिल में प्रकाश ऊर्जा का अवशोषण करने की क्षमता है. प्रकाश संश्लेषण का यही आधार है. यदि यह क्षमता नहीं होती तो प्रकाश-संश्लेषण संभव नहीं होता.

10 पेनिसिलिन की खोज

पेनिसिलिन एक एंटीबायोटिक है, जिसकी खोज 1928 में एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने की थी. हालांकि, एंटीबायोटिक शब्द का प्रयोग इससे पहले सेलमैन वाक्समैन द्वारा किया जा चुका था. एंटीबायोटिक वह पदार्थ है, जो सूक्ष्म जीव द्वारा उत्पत्र होता है और हमारे शरीर में सक्रिय घातक सूक्ष्म जीवों को मारने का काम करता है. जीवाणु नाशकों को र्जमिसिडिन एजेंट कहा जाता है और जो जीवाणुओं के विकास की रफ्तार को कम करते हैं उन्हें बैक्टीरियोस्टेटिक एजेंट कहा जाता है. विश्वी की सबसे पहली एंटीबायोटिक पेनिसिलिन है. एलेक्जेंडर फ्लेमिंग ने इसकी खोज स्टेफिलोकोकी नामक बैक्टीरिया पर शोध करेत हुए की थी. शोध के दौरान उन्होंने पाया कि बैक्टीरिया कल्चर प्लेट पर थोड़ी-सी फफूंदी उगी हुई है और जितनी दूर यह पेनेसिलियम नामक फफूंदी उगी हुई थी, उतनी दूर बैक्टीरिया नहीं थे. इसके बाद उन्होंने पेनेसिलियम नामक फफूंदी पर और शोध किया और पाया कि यह बैक्टीरिया को नष्ट करने में पूरी तरह सक्ष्म है. पेनेसिलियम से निकलने वाले द्रव ने प्लेट पर प.डे जीवाणुओं की गतिविधियों को धीमा कर दिया और आश्चनर्यजनक तरीके से आसपास के जीवाणु या तो मर गये या फिर दूर हट गये. शुरुआत में इसे एलेक्जेंडर फ्लेमिंग मोल्ड जूस का नाम दिया गया, जो बाद में पेनिसिलिन के नाम से जाना गया. इस तरह विश्वफ के पहले एंटीबायोटिक की खोज हुई, जिससे जीवाणुजनित कई बीमारियों का इलाज संभव हो सका. आज एंटीबायोटिक के बिना मेडिकल साइंस की कल्पना भी नहीं की जा सकती.
(Ref-prabhatkhabar.com)

2. दोबारा चलते-फिरते दिखेंगे लुप्त हुए जीव
मुकुल व्यास
वैज्ञानिक कुछ समय से उन जीव-जंतुओं को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं,जो एक जमाने पहले पृथ्वी से लुप्त हो चुके हैं। उनकी कोशिश का यह अर्थ नहीं है कि जुरासिक पार्क जैसी कोई चीज हमारे सामने आने वाली है। हॉलिवुड की इस चर्चित साइंस फिक्शन फिल्म में वैज्ञानिकों को सैकड़ों डायनोसोर प्रजातियों को पुनर्जीवित करते हुए दिखाया गया था। करोड़ों साल पहले लुप्त हो चुके डायनोसोरों को फिर से पैदा करना एक नामुमकिन सी बात है। लेकिन मैमथ (हाथी का करीबी, लेकिन उसके दोगुने कद वाला रिश्तेदार) और उड़ न पाने वाला भारी पक्षी डोडो कुछ ऐसे विलुप्त जीव है, जिन्हें वैज्ञानिक क्लोनिंग तकनीक के जरिए पुनर्जीवित करना चाहते हैं।

इस दिशा में उन्हें कुछ कामयाबी भी मिल रही है। पिछले दिनों ऑस्ट्रेलियाई वैज्ञानिकों ने क्लोनिंग तकनीक से एक अनोखे मेंढक का भ्रूण उत्पन्न कर दिया, जो 1983 में लुप्त हो गया था। यह मेंढक ऑस्ट्रेलिया में क्वींसलैंड के घने जंगलों में पाया जाता था। इसकी खासियत यह थी कि इसकी मादा अपने अंडे निगलने के बाद मुंह से अपनी संतानों को जन्म देती थी। प्राकृतिक आवास के विनाश और एक संक्रामक बीमारी ने इस अजीबोगरीब जीव की जाति ही नष्ट कर दी थी। वैज्ञानिकों ने लेजारस प्रोजेक्ट के तहत अपने प्रयोग में मेंढक की 'मृत' कोशिका के नाभिक को इससे मिलती-जुलती प्रजाति के ताजा अंडे में प्रत्यारोपित कर दिया। इसके लिए उन्होंने मेंढक के नमूनों का इस्तेमाल किया, जिन्हें पिछले 40 साल से एक डीप फ्रीजर में संभाल कर रखा गया था। इस प्रक्रिया में उत्पन्न कुछ अंडे विभाजित हो कर प्रारंभिक भ्रूण में तब्दील हो गए। ये भ्रूण कुछ दिन तक ही जिंदा रह पाए, लेकिन आनुवंशिक परीक्षणों से इस बात की पुष्टि हो गई कि विभाजित कोशिकाओं में विलुप्त मेंढक की जीन सामग्री मौजूद है।

इस प्रोजेक्ट से जुड़े प्रमुख वैज्ञानिक और न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर माइक आर्चर ने बताया कि हमने मृत कोशिकाओं को सक्रिय करके उन्हें जीवित कोशिकाओं में बदल दिया और इस प्रक्रिया में विलुप्त मेंढक के जीनोम (जीन समूह) को पुनर्जीवित कर दिया। विलुप्त मेंढक की ताजा कोशिकाओं का इस्तेमाल भविष्य में नए क्लोनिंग प्रयोगों के लिए किया जाएगा। इस प्रोजेक्ट पर काम कर रहे वैज्ञानिकों का मानना है कि उनके प्रयोग ने लुप्त जीव-जंतुओं को पुनर्जीवित करने का रास्ता खोल दिया है। उनका ख्याल है कि इस तकनीक से मारीशस के विलुप्त पक्षी डोडो, साइबेरिया के मैमथ और न्यूजीलैंड के विशाल मोआ पक्षी को फिर से पैदा करना संभव है। प्रो. आर्चर कहना है कि विलुप्त जंतुओं के पुनर्जीवन में अड़चनें सिर्फ तकनीकी हैं, इसके लिए जैविक तौर पर कोई रुकावट नहीं है। इस तकनीक का उपयोग ऐसे जीव-जंतुओं के संरक्षण के लिए भी किया जा सकता है, जिनके लुप्त होने का खतरा है।

प्रोआर्चर ने पिछले दिनों वॉशिंगटन में एक सम्मेलन के दौरान पहली बार अपने लेजारस प्रोजेक्ट केबारे में सार्वजनिक रूप से चर्चा की। नेशनल ज्योग्रैफिक सोसाइटी द्वारा आयोजित इस सम्मेलन मेंदुनिया के विभिन्न कोनों से आए रिसर्चरों ने विलुप्त जीव-जंतुओं और पौधों को फिर से जीवित करनेके उपायों पर विचार किया और इस संबंध में अब तक की प्रगति का जायजा लिया। आर्चर ने सम्मेलनको बताया कि उनका इरादा अब ऑस्ट्रेलिया के विलुप्त तस्मानियाई बाघ को क्लोनिंग के जरियेपुनर्जीवित करने का है।

विलुप्त जीवों को पुनर्जीवित करने की कोशिश में सबसे दिलचस्प मामला मैमथ का है। वैज्ञानिकों काकहना है कि हाथी का यह नजदीकी रिश्तेदार 20 साल के अंदर साइबेरिया के घास के मैदानों में फिर सेचहलकदमी करता हुआ दिख सकता है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों की कई टीमें उत्तरी रूस से मिलेमैमथ जीवाश्मों के डीएनए के विश्लेषण से उसका जीन मैप बनाने की कोशिश कर रही हैं। रूस औरदक्षिण कोरिया के वैज्ञानिकों ने मैमथ का जीवित नमूना तैयार करने के लिए एक बड़ा प्रोजेक्ट शुरूकिया है। इस प्रोजेक्ट के लिए वे मैमथ कोशिका के नाभिक और एशियाई हाथी के अंडाणु का इस्तेमालकरेंगे। यह बहुत ही चुनौतीपूर्ण लक्ष्य है क्योंकि हाथी से अंडाणु हासिल करने में अभी तक किसी को भीसफलता नहीं मिली है। जापानी वैज्ञानिक पांच साल के अंदर मैमथ का क्लोन तैयार करने का सपनादेख रहे हैं।

हावर्ड यूनिवर्सिटी के आनुवंशिक वैज्ञानिक जार्ज चर्च का कहना है कि करीब 4000 वर्ष पहले विलुप्तहो जाने के बावजूद साइबेरिया की बर्फीली जमीन में सुरक्षित मैमथ जीवाश्मों से डीएनए निकालनासंभव है। चर्च के मुताबिक मैमथ के सही-सही जीन नक्शे के आधार पर एशियाई हाथी के जीन-नक्शेको संशोधित किया जाएगा। संशोधित जीन नक्शे का मैमथ के जीन नक्शे से पूरी तरह मिलान होनेपर एशियाई हाथी के अंडाणु को निषेचित करके एक भ्रूण तैयार किया जाएगा। यह एक लंबी औरकठिन प्रक्रिया है। इस विधि से जन्म लेने वाला जीव मैमथ जैसा हो सकता हैलेकिन वह मैमथ कीहूबहू कॉपी नहीं होगा।

विलुप्त प्रजातियों के डीएनए के लिए बर्फ में सुरक्षित जीवाश्मों को सबसे अच्छा स्रोत माना जाता है।साइबेरिया के परमाफ्रॉस्ट (स्थायी रूप से जमी हुई जमीनमें मैमथ के कई जीवाश्म मिले हैंजोकाफी अच्छी हालत में हैं। लेकिन रिसर्च के लिए उपयोगी डीएनए का बर्फ में संरक्षण अनिवार्य नहीं है।रिसर्चरों ने संग्रहालयों में रखे विलुप्त जीवों के नमूनों से भी जीन सामग्री जुटा ली है। मसलनहावर्ड केआनुवंशिक वैज्ञानिकों ने एक संग्रहालय में रखे एक विलुप्त कबूतरपैसेंजर पिजन के 100 साल पुरानेनमूने के डीएनए से उसका जीन नक्शा तैयार कर लिया है। अब वे इस नक्शे के आधार पर पैसेंजरपिजन को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रहे हैं। पैसेंजर पिजन के विशिष्ट जीनों को एक सामान्यकबूतर में समाहित करके वे पैसेंजर पिजन जैसा पक्षी पैदा करने की कोशिश करेंगे। कुछ साल पहलेरिसर्चरों के एक अन्य दल ने तस्मानियाई बाघ के 100 साल पुराने नमूने से डीएनए अलग कर लियाथा।

कुछ विशेषज्ञों ने विलुप्त जीवों को फिर से जिंदा करने के प्रयोगों के औचित्य पर सवाल उठाए हैं।अमेरिका की ड्यूक यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर स्टुअर्ट पिम का कहना है कि बहुत सी प्रजातियां कुदरतीआवास के असुरक्षित होने के कारण पृथ्वी से ओझल हो गई थीं। ऐसी प्रजातियों को पुनर्जीवित करकेहम उनका क्या करेंगेऔर आखिर उन्हें बसाएंगे कहां?
विज्ञान और तकनीक की दुनियाँ परशशांक द्विवेदी

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