Tuesday, March 20, 2018

विश्व गौरैया दिवस World Sparrow Day

कैम्प के स्कूल में  'विश्व गौरैया दिवस' मनाया गया।
गौरैया के स्वागत के लिए लकड़ी का बर्ड हाउस विद्यालय प्रांगण में नीम के पेड़ पर  स्थापित किया गया।
क्लब सदस्य
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय कैम्प में बीस मॉर्च को विश्व गौरैया दिवस के अवसर पर जामुन ईको क्लब, हरियाणा विज्ञान मंच, सी वी रमन विपनेट विज्ञान क्लब के सदस्यों ने आयोजित कार्यक्रम में भाग लिया।
क्लब प्रभारी विज्ञान अध्यापक दर्शन लाल ने क्लब सदस्यों को बताया एक छोटा सा पक्षी गौरैया (स्पैरो) लुप्तप्रायः होती जा रही है। उसको  के सन्दर्भ में और समाज में इसके प्रति जागरूकता फ़ैलाने के उद्देश्य से विश्व गौरैया दिवस विश्व भर में प्रत्येक वर्ष 20 मार्च को मनाया जाता है। मनुष्य ने अपनी प्रकृति विरोधी गतिविधियों से इस पक्षी को समाप्ति के कगार पर ला दिया है।
कौन सी चिड़िया है गौरैया?
एक छोटी सी चिड़िया जो सदियों से मनुष्य के साथ रहती आयी है को ही गौरैया नाम से बुलाते हैं। इसका वैज्ञानिक नाम पासर डोमेस्टिकस है व सामान्य नाम घरेलू गौरैया है। चाहे एशिया हो या यूरोप ये गौरेया रानी मनुष्य के साथ साथ हर जगह चली। इसके अतिरिक्त पूरे विश्व में अमरीका, अफ्रीका, न्यूज़ीलैंड और
आस्ट्रेलिया तथा अन्य मानव बस्तियों मे मनुष्य के साथ साथ इसने अपना भी घर बनाया।
गोरैया की 6 प्रजातियां हाउस स्पैरो, स्पेनिश स्पैरो, सिंड स्पैरो, रसेट स्पैरो, डेड सी स्पैरो और ट्री स्पैरो पाई जाती हैं।
इस लुप्त होती छोटी चिड़िया के लिए कक्षा छह के विद्यार्थियों ने प्रेम कुमार के नेतृत्व में एक परियोजना कार्य के अंतर्गत विद्यालय में नीम के पेड़ पर लकड़ी का बर्ड हाउस व अन्य पक्षियों के लिए जलपात्र व बाजरा पात्र स्थापित किये। इस अवसर पर कक्षा छह की मॉनिटर छात्रा दिव्या शर्मा व गगन शर्मा ने चिड़ियों को चुगाने के लिए पाँच किलोग्राम बाजरा दिया।
मौके पर मनीष, अरुण, सौरव, प्रेम, नाजिश, प्रिया, दिव्या, लोकबहादुर, विशाल, अरुण कुमार कैहरबा, सुरेश रावल व दिलीप दहिया मौजूद रहे।
महत्त्वपूर्ण बातें.......
आखिर गौरैया गयी कहाँ?
जैसे गिद्ध लुप्त हो गए वैसे ही गौरैया पर क्या संकट आया इस बारे पक्षी विज्ञानियों को ये कारण समझ आये।
लकड़ी का बर्ड हाउस
आजकल के सघन आबादी के आधुनिक बंद घरों में अब आंगन नही होते हैं इन घरों में गौरैया के रहने के लिए जगह नहीं बची है। पिसा पिसाया थैली वाला आटा ओर पैकेट बंद चावल लाने के कारण घर में अब न तो छतों पर गेहूँ ही सूखने डाली जाती हैं न ही धान कूटा जाता हैं जिससे उन्हें छत पर उन्हें अपना भोजन यानी दाने नही मिलते।
आधुनिक बन्द डिबिया जैसे घरों में उनके घुसने के लिए खुले रोशनदान नही रहे।
कृषि में कीटनाशकों का प्रयोग बढ़ गया है जिसका असर गौरैया के खाद्य चक्र व  प्रजनन तंत्र पर पड़ रहा है।
मोबाइल टावर, तारों का जाल भी जिम्मेदार हैं।
डॉ0 राजीव कलसी 
डॉ राजीव कलसी के अनुसार
99 प्रतिशत कम  हो चुकी हैं गौरैया
मुकंद लाल नेशनल कालेज के प्रोफेसर व पक्षी विज्ञानी डाक्टर राजीव कलसी के  अनुसार यमुनानगर के शहरी क्षेत्र में गौरैया की मानव आबादी के साथ उसकी प्रतिभागिता में 99 प्रतिशत तक की कमी आ गयी है। वास्तव में 1980 से ही इनकी संख्या में कमी आना शुरू हो चुका था फिर भी इनके संरक्षण के उचित प्रयास नहीं किए गए। अब यमुनानगर जिले के मात्र कुछ ग्रामीण इलाकों की आबादी में इनका पाया जाना ही रिपोर्ट हुआ है। ऐसा रहा तो हो सकता है कि गौरैया इतिहास की चीज ही न बन जाए और भावी पीढ़ियों को गौरैया देखने को भी न मिले।
दर्शन लाल बवेजा
अखबारों में



 Darshan Lal Baweja
Science Teacher Cum Science Communicator
Secretary C V Raman VIPNET science Club VP-HR 0006 (Platinum category Science club-2017)  Yamuna Nagar
Distt. Coordinator NCSC-DST, Haryana Vigyan Manch Rohtak, Science Blogger,
Master Trainer for Low/Zero Cost Science Experiments, Simple Science Experiments, TLM (Science) Developer
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1 comment:

  1. बहुत सही लिखा जी

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