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Saturday, April 28, 2012

शुक्र ग्रह का पारगमन, 6 जून 2012 Transit of Venus June 6, 2012

शुक्र ग्रह का पारगमन, 6 जून 2012 Transit of Venus June 6, 2012
6 जून 2012 को शुक्र का सूर्य पर दुर्लभ पारगमन होगा और इस घटना को पूरे देश मे देखा जा सकेगा।
6 जून 2012 को शुक्र ग्रह का पारगमन होने जा रहा है, अर्थात् शुक्र ग्रह सूर्य के सामने से होकर गुजरेगा। देखने के लिहाज से बेशक यह घटना पूर्ण सूर्यग्रहण जैसी भव्य नहीं होगी लेकिन यह बहुत दुर्लभ खगोलीय घटना होने के कारण खगोलविज्ञानियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह जानना रोचक है कि पिछले पारगमन 1874, 1882 और 2004 में हुए थे और आज इन तीनों परिघटनाओं का कोई भी गवाह इस दुनिया में नहीं है। अगर आपने 8 जून 2004 का शुक्र पारगमन देखा तो आप निश्चित रूप से 6 जून  2012 को इस घटना को दुबारा देख पाने वाले भाग्यशाली लोगो में से होंगे।

पारगमन क्या होते हैं?

चित्र में धरती से देखने पर शुक्र के सम्पर्क के क्षणों को दिखाया गया है।
धरती के अलग अलग स्थानों से देखने पर सम्पर्क के समय में कुछ सेकण्ड
या मिनट का अंतर होता है। यह पूरी घटना 6 घंटे का समय लेती है। चित्रा
में दिया गया समय अंतरराष्ट्रीय मानक समय अथवा ग्रीनविच समय है।
जब चांद, पृथ्वी और सूर्य के बीच में आता है तो इसे सूर्यग्रहण कहा जाता
है। मगर शुक्र या बुध जैसे आंतरिक ग्रह पृथ्वी और सूर्य के बीच आते हैं
तो यह घटना पारगमन कहलाती है। 6 जून 2012 को हमें मौका मिल रहा
है कि हम शुक्र ग्रह को सूर्य के आगे से गुजरता हुआ देख पायेंगे। लेकिन

2004 की तरह हम पारगमन के पूरे घटनाक्रम को भारत से नहीं देख सकेंगे।
यहां पर जब सूर्य उगेगा तो शुक्र पारगमन की अवस्था में आ चुका होगा।
धरती से देखने पर शुक्र और बुध ग्रह का आकार चांद के मुकाबले बहुत छोटा
है। इसलिए जब ये सूर्य के सामने से गुजरते हैं तो एक छोटे से काले बिंदु
जितना ही आकार बना पाते हैं। ग्रह पारगमन के समय सूर्य के सामने से
गुजरते हुए कैसा रास्ता तय करेगा यह उसकी गति की ज्यामिति पर निर्भर
करता है। पारगमन की घटना आम तौर पर बहुत कम होती है क्योंकि पृथ्वी
की दीर्घ वृत्तीय कक्षा और इन ग्रहों की कक्षाओं के बीच थोड़ा सा झुकाव
होता है। इस झुकाव के कारण ये ग्रह पृथ्वी की कक्षा के दीर्घवृत्तीय तल से
कुछ ऊपर (उत्तर) या नीचे (दक्षिण) रहते हैं।
बुध ग्रह का पारगमन एक सदी मे 13 से 14 बार देखा जा सकता है।
इक्कीसवीं सदी का पहला बुध पारगमन 7 मई, 2003 को देखा गया जिसे
पूरे देश में देखा गया था। जबकि शुक्र का पारगमन ग्रहों की व्यवस्था में
अधिक दुर्लभ घटना है। वास्तव में दूरबीन के आविष्कार के बाद केवल 7
बार यह घटना हुई है (1631,1639,1761,1769,1874, 1882, और 2004)।
शुक्र का पारगमन क्या है?
जब शुक्र ग्रह सूर्य के सामने से होकर गुजरता है तो यह घटना शुक्र पारगमन कहलाती है। इसघटना के समय शुक्र ग्रह एक छोटे काले चक्के जैसा (सूर्य के ऊपर से) धीरे-धीरे चलता हुआ दिखता है।
शुक्र और बुध की कक्षाएं पृथ्वी की कक्षा के भीतर हैं इसलिए केवल ये ग्रह ही पृथ्वी और सूर्य के बीच से होकर गुजरते हैं। पारगमन एक बहुत दुर्लभ खगोलीय घटना है और शुक्र का पारगमन बुध के पारगमन की तुलना में और भी अधिक दुर्लभ है। बुध के पारगमन की बात करें तो यह औसतन एक शताब्दि में तेरह बार होता है, जबकि शुक्र पारगमन 243 सालों में केवल चार बार ही होता है। यह घटना जोड़े में होती है, दो पारगमन 8 साल के अंतराल में होती हैं और अगले दो पारगमन एक शताब्दि से भी अधिक समय बाद होते है।
शुक्र पारगमन कब होता है? पारगमन कब-कब देखे गए?
शुक्र पारगमन की दुर्लभ परिघटना 6 जून 2012 को होने जा रही है। इसके बाद यह परिघटना दिसम्बर 2117 और दिसम्बर 2125 में होगी। इससे पहले यह 2004 में हुआ था। इस घटना को देखने का पहला प्रमाण 1639 में मिलता है जब खगोलशास्त्री जेरेमिया होरॉक्स ने इसे देखा था, यह दूरदर्शी के आविष्कार के तीन दशक बाद की बात है। इसके बाद 1761, 1769,1874,1882 और 2004 में शुक्र पारगमन को देखा जा सका। 1761 और 1874 के पारगमन भारत से पूर्ण रूप से देखे गए। 8 जून 2004 का पारगमन भी भारत से पूरी तरह देखा गया था जबकि 6 जून 2012 को होने वाले पारगमन में भारत से पहला और दूसरा संपर्क नहीं दिखाई देगा। जब सूर्योदय होगा तो शुक्र सूर्य के सामने जा चुका होगा। दुबारा 9 जून, 2225 को ही पूरा पारगमन भारत से देखा जा सकेगा।
शुक्र का पारगमन इतनी दुर्लभ घटना क्यों है?
शुक्र और पृथ्वी के कक्षीय तलों के बीच 3.4 अंश का झुकाव
शुक्र और पृथ्वी के कक्षीय तलों के बीच 3.4 अंश का झुकाव शुक्र पारगमन का दोहराव एक विचित्रा पैटर्न में होता है। 1882 के बाद यह घटना 121.5 साल बाद जून  2004 में हुई, इसके 8 साल बाद 2012 में देखी जा सकेगी। 2012 के बाद शुक्र पुनः पारगमन की परिघटना 105.5 साल बाद होगी जबकि उसके बाद यह 8 साल बाद होगी। शुक्र पारगमन की घटना की आवृत्ति में इतना बड़ा अंतर पृथ्वी और शुक्र की कक्षीय तलों में अंतर के कारण होता है। अगर शुक्र और पृथ्वी सूर्य के साथ समान तल में होते तो पारगमन की आवृत्ति अधिक होती।
सभी राज्यों की राजधानियों के शुक्र पारगमन की समय सारणी 







एडमण्ड हैली (1656-1742) ने महसूस किया कि पारगमन सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी को नापने में महत्वपूर्ण हो सकता है। जैसा कि हमें पता है कैपलर का नियम हमें ग्रहों के बीच की सापेक्ष दूरियों के बारे में बताता है, लेकिन इससे सही दूरी का पता नहीं चलता।  हैली अपने जीवन काल में शुक्र पारगमन की कोई घटना नहीं देख पाया  किन उसकी कोशिशों का असर 1761 और 1769 के अवलोकनों पर पड़ा और खगोलशास्त्री पहली बार धरती से सूरज की दूरी का ठीक ठीक अनुमान लगा पाने में सक्षम हुए। एक समय में धरती के अलग-अलग जगहों से देखते  हुए सामान्य ज्यामितिका उपयोग करके हम सूर्य तक की दूरी जान सकते हैं। आज हमारे पास इसके लिए बहुत सही माप बताने वाली कई विधियां हैं पर 18वीं और 19वीं में बारीकी से किए गए अवलोकनों से हमे जो परिणाम मिले उनमें 1 प्रतिशत ही त्राुटि है। पृथ्वी के दो अलग अलग स्थानों से अवलोकन करने पर सूर्य पर शुक्र के दो अलग अलग रास्ते दिखाई देते हैं। दोनों रास्तों से सूर्य के एक किनारे से दूसरे किनारे को तय करने में समय का जो थोड़ा सा अंतर आता है, उसकी सहायता से कुछ गणनाएं कर कधरती से सूर्य की दूरी को आसानी से जाना जा सकता है। इसी तरह सौरमण्डल के आकार की भी गणना की जाती है। एडमण्ड हैली ने विभिन्न राष्ट्रों को सलाह दी कि वे दुनिया भर में भावी पारगमन की घटनाओं के  अवलोकन के लिए अभियान दल भेजें। 17वीं और 18वीं शताब्दि के साहसी खोजियों ने जोखिम और अवसाद को चुनौती दी और उस समय के सबसे बड़े सवाल को हल करने की कोशिश की और कठिनाई भरी समुद्री यात्राएं की। उन साहसी लोगों मे से सब अपने घर वापसी के लिए सफर शुरू  नहीं कर पाए।
जैसाकि शुक्र और पृथ्वी के कक्षीय तलों के बीच 3.4 अंश का झुकाव है इसलिए जब भी शुक्र, पृथ्वी और सूर्य के बीच से होकर गुजरता है तो वह सूर्य से थोड़ा सा ऊपर या नीचे होता है और सूर्य की तेज चमक के कारण दिख नहीं पाता। जब कभी शुक्र, पृथ्वी और सूर्य के बीच नोड्स से गुजरता है और ये तीनों एक सरल रेखा पर स्थित हो तो पारगमन दिखाई देता है। नोड्स वे बिंदु कहलाते हैं जहां पर शुक्र की कक्षा पृथ्वी के दीर्घवृत्तीय कक्षीय तल को काटती है।
जिस जगह पर ग्रह दक्षिण से उत्तर की ओर आते हुए कक्षीय तल को काटता है उसे आरोही नोड कहते हैं जबकि जिस बिंदु पर ग्रह उत्तर से दक्षिण की ओर आते हुए कक्षीय तल को काटता है उसे अवरोह नोड कहते हैं। शुक्र को सूर्य का एक चक्कर पूरा करने में 225 दिन का समय लगता है जबकि पृथ्वी 365 दिन में सूर्य का चक्कर पूरा करती है। इसका मतलब है कि जब शुक्र नोड से होकर गुजरे तब पृथ्वी भी वहां से गुजरे ये जरूरी नहीं। इसीलिए जब ये संयोग होता है तभी शुक्र पारगमन होता है। पारगमन की आवृत्ति के पीछे कुछ और प्रभाव भी असर करते हैं। 2004 का पारगमन अवरोही नोड के पास दिखा था। 2012 में होने वाला पारगमन भी अवरोही नोड के पास ही दिखाई देगा।
शुक्र पारगमन की घटना का क्या महत्व है?
शुक्र पारगमन की घटना हमारा ध्यान ग्रहों की जटिल गतियों, केपलर के नियम, गति और गुरुत्व आदि की ओर खींचती है। पारगमन की दुर्लभता और दोहराव हमें दिखाते हैं कि खगोलीय घटनाओं के पूर्वानुमान की गणना में किस तरह की कठिनाइयां आती है। 1761 के पारगमन ने मिखाइल लोमोनोसोवनाम के वैज्ञानिक को एक अवसर दिया जिससे वह सिद्ध कर पाया कि शुक्र ग्रह में वातावरण है। इस वातावरण को एक धुंधले आभामंडल के रूप में देखा गया था। शुक्र पारगमन के अवलोकन से शुक्र ग्रह के आकार के बारे में भी जानकारी मिलती है। सबसे महत्वपूर्ण यह कि पारगमन के अवलोकन के द्वारा हमें पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी को ज्ञात कर सकते हैं
ब्लेक ड्रॉप इफैक्टका अर्थ-
ब्लेक ड्रॅाप प्रभाव
ब्लेक ड्रॅाप प्रभाव- पिछले शुक्र पारगमन की घटनाओं का अवलोकन करने में सबसे बड़ी समस्या यह देखने में आई कि शुक्र ठीक किस क्षण सूर्य के ऊपर पूरी तरह आया, यह निर्धारित करना कठिन हो गया। यह क्षण जब शुक्र पूरी तरह सूर्य के ऊपर आता है वह क्षण दूसरे सम्पर्कका क्षण कहलाता है। यह क्षण बहुत महत्वपूर्ण होता है जब शुक्र पूरी तरह से सूर्य के भीतरी किनारे से चिपका हुआ दिखता है। इसके तुरंत बाद शुक्र सूर्य के सम्पर्क बिंदु के पास खिंचा हुआ दिखता है जिसके कारण शुक्र का आकार कुछ बिगड़ा हुआ लगने लगता है। जब शुक्र सूर्य के भीतरी किनारे से अंदर की ओर खिसकना शुरू होताहै तो अवलोकन करने वाले के लिए सम्पर्क के क्षण का ठीक ठीक अवलोकन कर पाना बहुत ही कठिन हो जाता है। इस रहस्यमयी ब्लैक ड्रॉप इफैक्ट के कारण सम्पर्क का सही अवलोकन नहीं हो पाता। ब्लैक ड्रॉप इफैक्टदो प्रभावों के कारण होता है। एक तो दूरबीन के कारण छवि का स्वाभाविक रूप से धुंधला होना जिसे जीम 'Point spread function' कहा जाता है और यह वातावरण में होने वाले विक्षोभ के कारण होता है। दूसरा सूर्य के किनारे पर चमक के कम होने के कारण होता है जिसे खगोलविज्ञानी 'Limb Darkening'  के नाम से जानते है।
06 जून, 2012 को शुक्र पारगमन कहां से दिखेगा?
शुक्र पारगमन पथ अर्थात शुक्र जिस जगह से दिखाई देगा इस चित्र के माध्यम से वह दर्शाया गया है।
नोट : राजनीतिक मानचित्र नहीं है।

06 जून, 2012 का पारगमन रुस, मंगोलिया, चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम, अलास्का, न्यूजीलैंड इत्यादि पेसीफिक द्वीपों से दिखेगा। आस्ट्रेलिया, इन्डोनेशिया, बर्मा, मलेशिया और भारत के अलावा अतिरिक्त पश्चिमी एशिया के देशों में सूर्योदय के समय पारगमन शुरु हो चुका होगा। भारत में पारगमन के सम्पर्क 1 और सम्पर्क 2 सूर्योदय से पहले ही हो चुके होंगे, पर महत्म पारगमन तथा सम्पर्क 3 और 4 देखें जा सकेंगे।
पारगमन को देखना कितना सुरक्षित है?
सूर्य को कभी भी दूरबीन या खुली आंखों से सीधे नहीं देखना चाहिए। बिना सुरक्षा उपकरणों के सूर्य को देखने से आंख में स्थाई क्षति या अंधापन हो सकता है। सूरज को देखने का सबसे सुरक्षित और सुलभ तरीका है उसका प्रक्षेपण (Projection) करके छवि देखना। इसके लिए किसी पिनहोल या महीन छिद्र को किसी परदे से एक मीटर दूरी पर खते हैं जिससे परदे पर सूर्य का प्रतिबिंब बन जाता है।
किसी दूरबीन को ट्राइपॉड पर लगाकर उससे भी सूर्य का अच्छा और बड़ा प्रतिबिंब किसी सफेद परदे पर लिया जा सकता है, लेकिन ध्यान रहे कि कोई इससे सीधे सूर्य को न देखे। प्रक्षेपण विधि का सबसे बड़ा फायदा यह है कि हमें सूर्य को सीधे देखने की जरूरत नहीं होती।
क्या करें?
केवल सौर डिस्क का प्रक्षिप्त बिम्ब देंखे।
दूरबीन/बाइनाक्यूलर और पिनहॉल कैमरे से सूर्य के बिम्ब का प्रेक्षेपण पिन होल, दूरबीन या बाइनाक्यूलर की एक जोड़ी द्वारा एक छायादार दीवार पर सूर्य के प्रतिबिम्ब को प्रेक्षिपित करें।
केवल वैज्ञानिक रूप से जांचे गये सौर फिल्टर का इस्तेमाल करक ही सूर्य की ओर देखना चाहिए। ध्यान देने वाली बात है कि सिर्फ तीक्ष्ण दृष्टि वाले व्यक्ति ही सूर्य के डिस्क पर शुक्र को एक छोटे काले धब्बे के रूप में देख सकेंगे। पारगमन के दौरान काला धब्बा सौर डिस्क के उत्तरी भाग में पूर्व से पश्चिम की ओर पार करता दिखाई देगा।
क्या न करें?
बिना सुरक्षित सौर फिल्टर के, खुली आंखों से पारगमन की किसी भी कला को देखने का प्रयास न करें।
दूरबीन या बाइनाक्यूलर से सीधे कभी न देखें।
धुएंदार कांच, रंगीन फिल्म, धूप के चश्मे, अनवरित श्वेत-श्याम फिल्म, फोटोग्राफिक ट्रल डेन्सिटी फिल्टर तथा पोलराइजिंग फिल्टरों का इस्तेमाल न करें। ये सभी सुरक्षित नहीं हैं।
फिल्टर के साथ भी सूर्य की ओर लगातार न देखें, कुछ सकेंड के अंतराल पर देखें।
संदर्भ : श्री बी.के. त्यागी जी 
द्वारा : दर्शन बवेजा विज्ञान अध्यापक सी.वी.रमण विज्ञान क्लब यमुनानगर हरियाणा 

3 comments:

  1. दर्शन जी शानदार जानकारी के लिए शुक्रिया

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