My Name on Mars

Tuesday, May 31, 2011

विधुत मोटर का एक साधारण सा माडल-२ Simplest Electric Motor-2


विधुत मोटर का साधारण सा माडल-२  Simplest Electric Motor-2
विधुत मोटर के वैकल्पिक माडल बनाने की शृंखला में कक्षा सात के बच्चों को विधुत मोटर का यह नवीनतम और साधारण माडल बना कर दिखाया गया 
Simplest Electric Motor-2
 इस को बनने के लिए एक शुष्क सैल,एक बेलनाकार चुम्बक और एक  जूतियाँ गाठने में प्रयुक्त होने वाली कील,तार का एक टुकड़ा चाहिये.
बच्चों की उत्सुकता देखते हुए अब यह सोचा गया है कईं प्रकार की कम लागत की विधुत मोटर बनाने के एक प्रोजेक्ट पर बच्चों को लगाया जाए.
इसी शृंखला मे यह दूसरी विधुत मोटर  आप देखें जिसको बच्चों ने बनाया और खुद ही चला कर भी देखा.
खुद काम करके बच्चे बहुत ही खुश होते हैं कम साधनों वाले स्कूलों मे अध्यापक के जिम्मेदारी कई गुणा बढ़ जाती है कि वो इन बच्चों को भी वो नए नए प्रयोग जुटा कर और कर के दिखाए. इस का एक लाभ यह भी होता है बच्चा तमाम उम्र याद रखता है कि हमने अपने स्कूल मे यह विज्ञान का प्रयोग किया था.
ऐसे लगा लेवें सेल,कील,चुम्बक  
पूरा परिपथ 
सबसे पहले सैल की टोपी की तरफ यानी धन ध्रुव पर कील की नोक और कील की टोपी पर चुम्बक चिपका लेते हैं.फिर तार के टुकड़े को दोनों तरफ से छील कर एक सिर सेल के ऋण ध्रुव पर और दुसरा सिरा बेलनाकार चुम्बक से टच करवाते हैं.
और हम क्या देखते हैं कि कील पर चिपकी हुई चुम्बक तेजी से घूमने लगती हैं.
            चुम्बक की धातु विधुत की सुचालक है और तार भी जब परिपथ पूरा होता है यानी तार का सिरा चुम्बक से स्पर्श करता है तो सामान ध्रुवों के प्रतिकर्षण के कारण वेह सिरा धकेला जता है और विपरीत ध्रुवों के आकर्षण के कारण दुसरा सिरा आकर्षित किया जाता है यह क्रिया बार बार दोहराई जाती है और चुम्बक कील की धुरी पर घूमने लगता है और कील मे चुम्बकत्व आ जाने के कारण वो सेल से चिपका रहता है .
सब बच्चों ने ताली बजाई और जमूरा खुश हुआ,किसी बच्चे ने सामान ले लिया कि मै बना के देखता हूँ फिर सब बारी बारी बना कर देखेंगे, सीखेंगे तोड़ फोड़ कर सामान वापस कर देंगे.
देखें यह वीडियो जो अपना खुद का बनाया हुआ है.
 




किसी ने कहा है कि इस ब्लॉग के इतने फोलोवर और रीडर हैं पर टिप्पणी नहीं आती है ?? मैंने उन को कहा कि मुझे क्या पता ??
प्रस्तुति :- सी.वी.रमन साइंस क्लब यमुना नगर हरियाणा
द्वारा :-दर्शन बवेजा,विज्ञान अध्यापक,यमुना नगर,हरियाणा
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Saturday, May 28, 2011

विज्ञान पहेली-17 Science Quiz-17 (और Science Quiz-16 का उत्तर)

विज्ञान पहेली-17 Science Quiz-17 (और Science Quiz-16 का उत्तर)
इस पहेली का जवाब है
मोर के चूजे  
और इस पहेली का जवाब दिया है 

Indranil Bhattacharjee ........"सैल"

आपको  बहुत बहुत बधाईयाँ …….
मोर के बारे मे विस्तृत जानकारी यहाँ से प्राप्त करें 
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विज्ञान पहेली -17 ........ Science Quiz -17
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 रसायन प्रयोगशाला के इन तीन ग्लास उपकरणों के नाम बताना है अलग अलग टिप्पणी मे बताने पर गलत उत्तर बहार निकाला जा सकता है.







 पहेली का जवाब 8-6-2011, रात्री 8 बजे तक दे सकते है |


                        पहेली का परिणाम 8-6-2011, रात्री 9 बजे |


    प्रस्तुति :- सी.वी.रमन साइंस क्लब यमुना नगर हरियाणा
    द्वारा :-दर्शन बवेजा,विज्ञान अध्यापक,यमुना नगर,हरियाणा
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Tuesday, May 24, 2011

खूनी पंजे छापना और भूत भगाना Khuni Panja

खूनी पंजे छापना और भूत भगाना Khuni Panja
लाल पंजों के निशान 
अंतर्राष्ट्रीय रसायन वर्ष के तहत आज स्कूली बच्चों को यह बताया गया कि किस प्रकार ठग बाबे सयाने मियाँ मासूम लोगों को तथाकथित चमत्कार दिखा कर गुमराह करते है और लुटते हैं |
चमत्कारों  के पीछे रसायन शास्त्र
रसायन शास्त्र  का प्रयोग कर के वो लोगो को रासायनिक क्रियाओं के द्वारा बेवकूफ बनाते हैं |
आज ऐसा ही एक प्रयोग कर के दिखाया गया
इस चमत्कार से जुड़ी कहानी पहले सुनाई जाए फिर प्रयोग का खुलासा करने मे आसानी होगी |
एक औरत रोती  हुई एक बाबे की कुटिया मे जाती है और वो वहाँ पर सयानों को बताती है कि उस के घर सब बीमार रहते है आप कोई ऐसा चमत्कार कर दो कि सब ठीक हो जाए, बाबे ने अपनी पोटली से एक पीला कपड़ा निकाला और उस ओरत के हाथ अपने लोटे के जल से धुलवाए और उस पीले कपड़े पर गीले गीले हाथ रखने को कहा; वह ओरत अपने हाथ पीले कपडे पर रख देती है बाबा जी मन्त्र पढ़ते हैं और हाथ उठाने को कहता है तो पीले कपडे पर दोनों खूनी पंजे छप जाते हैं |
बाबा उस ओरत को कहता है जाओ अब तुम्हारे अंदर से मैंने खूनी-प्यासी आत्मा निकाल दी है और उस के सब गहने और नगदी ले कर फरार हो जाते है |
आओ अब जाने ये खूनी पंजे कैसे छप जाते है ?
आवश्यक सामान 
पीला  कपड़ा : एक बर्तन मे पानी मे हल्दी का पाउडर घोल कर उस मे एक सफ़ेद कपड़ा डुबो लेते हैं उस सफेद कपडे पर हल्दी का पीला रंग चढ जाता है|
चूने का घोल : फिर पानी मे सफेदी करने वाला चूना डाल कर घोल लेते हैं थोड़ी देर मे चूना पाउडर नीचे बैठ जाता है और चुने का पारदर्शक घोल बच जाता है|




कल्ब सदस्य प्रयोग करते हुए 
कैसे किया : 
इस घोल से हाथ धुलवा कर जब गीले हाथ पीले कपडे पर रखने से हल्दी के साथ चूने के पानी की क्रिया होती है
 तो लाल लहू जैसा रंग के पंजे पीले कपडे पर छप गए;
हल्दी की क्षार के साथ क्रिया लाल रंग उत्त्पन्न करती है
ऐसा दैनिक जीवन में तब देखने को मिलता है जब कभी खाना खाते हुए सब्जी के दाग कपड़ो पर लग जाते हैं और जब उन कपड़ों को धोया जाता है तो साबुन (क्षार) के साथ क्रिया कर के वो लाल बन जाते है |

यह देखें सारे चित्र
लाल रंगें रुमाल 


प्रयोग सीख कर खुशी 
अब  देखें प्रयोग का यह चलचित्र 


प्रस्तुति :- सी.वी.रमन साइंस क्लब यमुना नगर हरियाणा
द्वारा :-दर्शन बवेजा,विज्ञान अध्यापक,यमुना नगर,हरियाणा
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Saturday, May 21, 2011

विज्ञान पहेली-16 Science Quiz-16 (और Science Quiz-15 का उत्तर)

                                      (: जन्मदिनी पोस्ट :)
विज्ञान पहेली-16 Science Quiz-16 (और Science Quiz-15 का उत्तर)
इस पहेली का जवाब है  
एमु के अंडे Emu eggs इस  पहेली का जवाब दिया है,
  जी ने इस कल्ब की पहेली को जीता है  और दूसरे स्थान पर हैं अपने

श्री राज भाटिया जी 
इनको बहुत बहुत बधाईयाँ. 


एमु पक्षी
एमु पक्षी मूलतः आस्ट्रेलिया का है एक सामान्य एमु अंडा 500 ग्राम्स वजन और 130 mm लंबा होता है| ऑस्ट्रेलिया का राष्ट्रीय पक्षी एमु किसानों के लिए मुर्गी पालन से कहीं ज्यादा बेहतर और आर्थिक दृष्टि से काफी फायदेमंद साबित होगा। करीब एक दशक पहले भारत में एमु बर्ड फार्मिंग की शुरुआत हुई थी। बर्फ जमाव की सर्दी से लेकर 55 डिग्री सेल्सियस से भी ज्यादा की गर्मी सहने की क्षमता रखने वाला यह पक्षी महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश, तमिलनाडू, गोवा, उड़ीसा, गुजरात, पंजाब के बाद अब राजस्थान में भी एमु बर्ड फार्मिंग की शुरुआत हो गई है।कुछ प्रगतिशील किसानों ने एमु फार्मिंग की ओर रुख किया है और उन्हें पूरा विश्वास है कि एमु उनके लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी साबित होगा।  
यह मुलायम भूरे पंखौं वाली एमु शुतुरमुर्ग से कुछछोटी है। लंबी गर्दन-टांगौं वाला यह पक्षी दौ मीटर तक ऊंचा हो  जाता है। आस्ट्रेलिया के घने जंगलौं में रहने वाली दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी यह चिडि़या है|
इसको  लेकर आए हैं सीएआरआई के वैज्ञानिक। इनका इरादा है एमु को पौल्ट्री के विकल्प के रूप में तैयार करने का।
एमु फार्मिंग
पालतू बनेगा यह पक्षी
जापानी बटेर, टर्की और अब बारी है एमु की। देश के वैज्ञानिक अब दुनिया की सबसे बड़ी चिडि़यौं में शामिल इस पक्षी को पालतू बनाने की तैयारी में हैं। मूल रूप से आस्ट्रेलिया में पाई जाने वाली यह चिडि़या पचास किलौ से अधिक वजन की हौ जाती है। घने जंगलौं में रहने वाली एमु को अब तक लोगो  ने चिडि़या घरों  में ही देखा है, लेकिन अब तयारी है इसके व्यावसायिक पालन की।
टर्की की प्रजातियां कर चुके हैं विकसित
इस दिशा में आगे बढ़ रहे सीएआरआई के वैज्ञानिको का मानना है कि एमु को  पोल्ट्री के विकल्प के रूप में अपनाया जा सकता है। यहां बता दे कि इस संस्थान के वैज्ञानिको ने कुछ वर्ष पहले आस्ट्रेलिया के ही एक दूसरे पक्षी टर्की की छौटे आकार वाली प्रजातियां विकसित की थीं। पांच से सात किलो  वजन वाली टर्की की यह प्रजातियां अब देश के कई क्षेत्रौं में व्यावसायिक उपयोग के लिए पाली जा रही है।
अब इमू को  लेकर काम शुरू
टर्की से मिली सफलता को  आगे बढ़ाते हुए संस्थान के वैज्ञानिकौं ने अब एमु को लेकर काम शुरू किया है। इनका मानना है कि आकार में शुतुरमुर्ग जैसी बड़ी एमु को भी पौल्ट्री के विकल्प के रूप में अपनाया जा सकता है। इसके लिए पहली जरूरत इस विदेशी पक्षी को  अपने देश के वातावरण में रहने का आदी बनाने की है। पहले चरण में सीएआरआई के वैज्ञानिक यही कार्य करेंगे। इसके साथ ही इसकी व्यावसायिक उपयोगिता का भी अध्ययन कराया जाएगा। 
महाराष्ट्र में हो  चुकी है शुरुआत
एक वर्ष पूर्व आस्ट्रेलिया के इस पक्षी को हैदराबाद से यहां लाने वाले मधुबन एमु फार्म के संचालक  ने बताया कि अपने देश में अभी एमु को लोग कम ही जानते हैं। महाराष्ट्र में कुछ लोगों  ने इसकी व्यावसायिक फार्मिंग शुरू की है। उन्हौंने बताया कि एमु का मीट बेहद स्वादिष्ट हौता है। इसमें फैट की मात्रा भी बहुत कम दो  प्रतिशत ही होती है, लेकिन इसके फैट से बनने वाले एमु आयल  से कई औषधियां बनती हैं। इस औषधीय उपयोग के चलते इसकी कीमत भी पांच हजार रुपये लीटर तक मिलती है। पचास किलो  तक वजन वाले एक वयस्क पक्षी से छह से सात लीटर तक तेल मिल जाता है। दीक्षित के अनुसार, प्रदेश में एमु की मांग तेजी से बढ़ रही है। इसके चलते इसके एक अंडे की कीमत 1500 रुपये तक पहुंच गई है। अभी ये अंडे एमु के बच्चे पाने के लिए ही बिक रहे हैं। जल्दी ही इसकौ लौग मीट का उपयौग करने के लिए भी पालने लगेंगे। बड़े काम का है एमु मात्र 18 माह के बाद ही करीब 600 ग्राम से भी ज्यादा भारी अण्डा देने वाले इस पक्षी के अण्डे की कीमत एक हजार से तीन हजार रुपए तक आंकी गयी है। एमु का मुख्य उपयोग विभिन्न प्रकार के तेलों हैलमेट बनाने, मीट सहित इसके नाखुन भी अच्छी कमाई का जरिया है। इसके अलावा बूट, बैल्ट, जैकेट, सजावटी वस्तुयें, नाखून, ज्वैलरी के अलावा मनुष्य की आँखों के क्षतिग्रस्त कोर्निया के काम लिया जा सकता है क्योंकि इस पक्षी को 10 मीटर तक साफ दिखाई देता है। एमु अपना ज्यादा समय बिना छत के खुले में रहना पसंद करता है। कम लागत में 35 साल तक आय देने वाले इस एमु के अण्डे देने का क्रम पहले साल 15 से शुरू होकर तीसरे साल ही करीब 35 से 40 की संख्या में पहुंच जाता है। - क्या है एमु 1997-98 में ऑस्ट्रेलिया से भारत प्रवेश करने वाले एमु को आम भाषा में 'आङूÓ कहा जाता है। जिसे कठिन से कठिन परिस्थितियों का सामना करने की क्षमता है। जन्म के समय एक फुट से भी कम लम्बा ये पक्षी बड़ा होकर आम इन्सान जितना करीब 5 फीट के लगभग लम्बा होता है। जोड़े में रहने वाले इस पक्षी में से अगर नर या मादा किसी एक ही मौत हो जाये तो दूसरा पक्षी आजीवन अकेला ही रहता है। मुलायम पंखों व भूरे, स्लेटी, काले व सफेद आदि रंगों में दिखने वाला ये प्यारा सा पक्षी झुंड में रहना पसंद करता है। आन्ध्रा में सोने का अण्डा देने वाली मुर्गी के नाम से मशहूर इस पक्षी की आयु 35 वर्ष तक है। ऑस्ट्रेलिया सरकार ने इसके निर्यात पर रोक लगाकर इसे राष्ट्रीय पक्षी का दर्जा दे रखा है।एमु से प्राप्त होने वाले तेल मार्केट में 4 से 6 हजार रु. लीटर है। कई औषधियों में काम आने वाले इस पक्षी के अंडे व प्रत्येक अंग फायदेमंद है। 
Emu Egg Facts, Size and Weight 

 

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विज्ञान पहेली -16 ........ Science Quiz -16
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यह किस पक्षी के चूजे हैं ? 
हेली का जवाब 30-5-2011, 8 बजे तक दे सकते है |
हेली का परिणाम 30-5-2011, 9 बजे |





प्रस्तुति :- सी.वी.रमन साइंस क्लब यमुना नगर हरियाणा
द्वारा :-दर्शन बवेजा,विज्ञान अध्यापक,यमुना नगर,हरियाणा
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उत्साहवर्धन करें |
 

Wednesday, May 18, 2011

बच्चे भी कमाल के जिज्ञासु होते हैं Amazing curious students

बच्चे भी कमाल के जिज्ञासु होते हैं | Amazing curious students.
बच्चे भी बस बच्चे ही होते है बस कहीं से उठा लाये पत्ते पर चिपकी हुई एक थैली . जो कि ऐसे फडफडाती थी जैसे उस थैली के अंदर कोई कैद हो.ये क्या है? यह क्या है?
चिल्लाते हुवे मेरे पास आये;
शायद इस विद्यालय मे मेरा 5-6 वर्षों के ठहराव का और विज्ञान  कल्ब गतिविधियों का यही  वो दूरगामी परिणाम है जिस के मद्देनजर विज्ञान प्रसार ने देश भर मे विपनेट क्लबों के गठन का कार्य शुरू किया था. आज स्कूल का हर एक बच्चा यह जानता है कि अपनी जिज्ञासा  को कहाँ पर ले कर जाना है अब बच्चे पहले की तरह झेंपते शर्माते नही है बस फट जिज्ञासा को उचित प्लेटफार्म पर ला खड़ा करते है ग्रामीण क्षेत्र  के झेपिलें शर्मीले बच्चे यदि इस प्रकार अपनी छोटी मोटी खोजे जारी रखें तो सरकार द्वारा विज्ञान प्रसार के लिए खर्चा गया एक एक पैसा सार्थक हो गया लगता है |
असल  मे बच्चे जो पत्ते पर चिपकी हुई थैली नुमा संरचना ले कर आये थे वह किसी कीट इंसेक्ट का प्यूपा अवस्था था 
बच्चों को 
अंडा >लार्वा >प्यूपा >पूर्ण कीट 
अवस्थाओं के बारे मे समझाने के बाद एक प्रस्ताव रखा गया कि क्या वो देखना चाहते है कि इस मे से क्या निकलेगा तो वो सहर्ष तैयार हो गए 
एक बीकर लाया गया,बीकर मे वो प्यूपा डाल कर,एक कागज मे हवा के लिए सुराख कर के बाँध कर रख दिया गया.
अगले ही दिन देखते है कि कोई परिवर्तन नहीं हुआ 
फिर अगले दिन देखते है कि बीकर मे एक हरी सुंदर सी तितली है बच्चे खुश हो जाते हैं और थोड़ा प्रयास करने के बाद वो तितली उड़ कर पौधों पर बैठ जाती है; 
प्यूपा जो लाया गया
प्रयोग के लिए तैयार बीकर
निकल गयी तितली तीसरे दिन















उड़ गयी तितली

प्यूपा की खाली झिल्ली


खुश है सब अपनी नयी खोज पर









बच्चे भी खुश  और उनके मास्टर जी भी खुश और आप ?
देखें यह हमारा उस तितली का उड़ने के प्रयासों का चलचित्र 
    
प्रस्तुति :- सी.वी.रमन साइंस क्लब यमुना नगर हरियाणा
द्वारा :-दर्शन बवेजा,विज्ञान अध्यापक,यमुना नगर,हरियाणा
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Saturday, May 14, 2011

विज्ञान पहेली-15 Science Quiz-15 (और Science Quiz-14 का उत्तर)

विज्ञान पहेली-15 Science Quiz-15 (और Science Quiz-14  का उत्तर)
मेंढक का विच्छेदन Dissection of Frog
इस पहेली का जवाब है मेंढक का विच्छेदन Dissection of Frog 
इस  पहेली का जवाब

Indranil Bhattacharjee ........"सैल"

जी ने देकर  फिर से लगातार तीसरी बार इस कल्ब की पहेली को जीता है इनको बहुत बहुत बधाईयाँ और दूसरे स्थान  पर रहे हैं श्री  श्री आशीष मिश्रा  जी (इनकी सही जवाब की टिप्पणी अचानक कही गायब हो गयी )
इस बार पहेली कुछ अस्पष्ट सी थी परन्तु फिर भी आप सब का बहुत बहुत धन्यवाद जी  

इस पहेली के जवाब को एक सत्य घटना से बताया जाएगा सन् 1983 की बात है एक 12-13 वर्ष का बच्चा मकान की तीसरी मंजिल से पड़ोस के मकान मे देखता है कि एक लड़का अपने घर के आंगन मे मेज़ पर कुछ कर रहा है गोरा रंग अधिक होने के कारण उस लड़के को देसी अंग्रेज की छेड़ से बुलाया जाता था, कोतुहलवश वो बच्चा नीचे उतर कर देसी अंग्रेज के घर की तरफ भागता है और रास्ते मे जो भी मिला उस को भी साथ लेता  गया कहता हुआ 'पता नहीं देसी अंग्रेज क्या कर रहा है|'
देसी अंग्रेज के घर पहुँच कर सब बच्चे यह देखते है कि वो किसी जीव को काट रहा है पहचान  कर एक दम  जीव के मेंढक होने कि घोषणा कर दी जाती है और सब ध्यान से देखने लगते है| यह क्या  है? यह क्या  कर रहे है? देसी अंग्रेज ने बताया कि मेरे जीव विज्ञान के प्रैक्टिकल मे मेंढक को काट कर उस के भीतरी अगों को देखने समझने का होता है फिर वो उस के अंगों के नाम निडिल लगा लगा कर बताने लगा जैसे यह ह्रदय,फेफड़े,अमाशय,छोटी आंत,बड़ी आंत,यकृत,धमनी,शिरा आदि अंग/अंगक  दिखाए |
उस बच्चे ने तभी ये सोचा कि वह भी यही पढ़ाई करेगा जिस मे मेंढक का विच्छेदन Dissection of Frog किया जाता है और उस ने किया 
मेरे बहुत से दोस्त कोमर्स और आर्ट्स की कक्षाओं से बायो लैब मे मेंढक का विच्छेदन देखने आते थे और मन मे कहीं दबी आवाज़ सुनाई देती थी हमने क्यूँ विज्ञान संकाय नहीं लिया. 
मैंने अपने विद्यार्थी जीवन मे  मेंढक,तिलचट्टा,खरगोश,अर्थवोर्म,फिश  का विच्छेदन किया और बहुत सीखा 
मेंढक,खरगोश,फिश सप्लायर अपने फ़ार्म से हमारे कोलिज को सप्लाई करता था तिलचट्टा,अर्थवोर्म हमने खुद पकडे थे |
परन्तु आज पशु प्रेम के चलते मेंढक का विच्छेदन Dissection of Frog स्लेबस से हटा दिया गया है स्कूलों की लैब्स मे मेंढक की सप्लाई करने वाले एजेंट अपने मेंढक फ़ार्म चलाते थे वो कोई खेतों और तालाबों से मेंढक थोड़े पकड़ कर लाते थे ये सम्भव ही नहीं हो सकता,इन पशु प्रेमियों को अपनी राजनीति का  धंधा चमकाने के लिए कोई और मुद्दा ना मिला तो इस महत्वपूर्ण प्रयोग को हटवा दिया | स्कूलों से ज्यादा मेंढक तो होटलों और रेस्त्रोरेंटों मे पलेटों मे परोसे जा रहे है |
मेरी शिक्षाविदों से यह सलाह है कि कक्षा नवम से बायोलोजी के पाठ्यक्रम मे कम से कम मेंढक,काक्रोच,केंचुवो,टिड्डी का विच्छेदन जरूर होना चाहिए | 
कुछ तो हम वैसे ही बेकार से स्लेबस को पढ़ रहें हैं कुछ ये नास मारने पर उतारूं है बाकी देश के शिक्षाविद कोई मुर्ख हैं जो वहां मेंढक का विच्छेदन अनिवार्य है |

छात्र नहीं करेंगे चीरफाड़ जीव विज्ञान की पढ़ाई के दौरान अब मेंढ़क और दूसरे जानवरों की चीरफाड़ पर रोक लगेगी। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की ओर से गठित विशेषज्ञों की एक कमेटी ने इस संदर्भ में अंतिम फैसला ले लिया है। इसकी आधिकारिक घोषणा आज होगी। जीव विज्ञान के विभिन्न विषयों की उच्च शिक्षा में प्रायोगिक अध्ययन के लिए विभिन्न जंतुओं की चीरफाड़ की जाती है। इस चीरफाड़ के विकल्प तलाशने के लिए बनाई गई कमेटी (एक्सपर्ट कमेटी टू कंसिडर डिसकंटीन्यूएशन ऑफ डिसेक्शन ऑफ एनिमल्स इन जूलॉजी, लाइफ साइंसेज) कोर मैम्बर्स और एक्सपर्ट के दो समूहों में बंटी थी। कमेटी की इस सप्ताह शुरू हुई कॉन्फ्रेंस के दौरान शनिवार को यह फैसला लिया गया कि स्नातक स्तर पर जंतुओं के विच्छेदन पर पूर्ण रोक लगेगी। लैब में केवल फैकल्टी ही आसानी से उपलब्ध किसी प्रजाति के जंतु का विच्छेदन कर छात्रों को दिखा सकेंगे, वहीं स्नातकोत्तर स्तर पर भी जो छात्र विच्छेदन नहीं करना चाहें उन्हें इसके स्थान पर जैव विविधता (बायोडायवर्सिटी) से जुड़े प्रोजेक्ट करने का विकल्प दिया गया है, मगर इस स्तर पर केवल चूहों के विच्छेदन की ही अनुमति दी गई है। उच्च शिक्षण संस्थानों को वाइल्ड लाइफ प्रोटेक्शन एक्ट 1972 और प्रिवेंशन ऑफ क्रुअलिटी टू एनिमल एक्ट 1960 का सख्ती से पालन करने के निर्देश दिए गए हैं। बायोलॉजी और जूलॉजी पढ़ाने वाले संस्थानों में विच्छेदन पर निगरानी के लिए कमेटी भी बनाई जाएगी। विच्छेदन के विकल्पों की कमेटी की मीटिंग में सिफारिश की गई है। राजस्थान यूनिवर्सिटी में इसके विकल्पों को लागू कराने के प्रयास किए जाएंगे। - डॉ. रीना माथुर, सदस्य, एक्सपर्ट कमेटी नए सिलेबस में 25 से घटाकर 5 अंक किए एमडीएस यूनि., अजमेर में एकेडमिक काउंसिल में एक प्रस्ताव पास कर जंतु विच्छेदन को कम करने का पहला प्रयास किया है। यूनिवर्सिटी के जूलॉजी डिपार्टमेंट के एचओडी डॉ. के.के. शर्मा ने एक नया सिलेबस तैयार कर जंतु विच्छेदन के टॉपिक के 25 से घटाकर 5 अंक कर दिए हैं।जीव विज्ञान की पढ़ाई के दौरान जंतुओं के प्रति क्रूरता को रोकने के लिए कोर कमेटी गठित की थी, जिसने अंतत: स्नातक स्तर पर जंतु विच्छेदन पर रोक लगाने का फैसला लिया है। - डॉ. बी. के शर्मा, सदस्य, कोर कमेटी(दैनिक भास्कर)

पारदर्शी मेंढक रोकेंगे जीवित मेंढकों की चीरफाड़

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आप छात्र हैं और डॉक्टर बनना चाहते हैं। लेकिन प्रयोगों के दौरान मेंढक काटना पड़ेगा इसके चलते कई बायोलॉजी छोड़ देते हैं। या फिर आप पशु प्रेमी हैं मेढकों की चीड़फाड़ आपको पसंद नहीं तो वैज्ञानिकों ने इसका निदान ढूंढ लिया है।
अब जिंदा मेढकों को काटने के लिए मोम की प्लेट पर सुइयों से बींधने की जरूरत नहीं पडे़गी, क्योंकि प्रयोगों में इस्तेमाल के लिए खास तौर पर विकसित पारदर्शी मेढक अगले छह महीनों में प्रयोगशालाओं तक पहुंच रहे हैं।
करीब दो साल पहले प्रयोगशाला में तैयार पारदर्शी मेढकों के बाद अब जापान के ही वैज्ञानिकों ने पारदर्शी मछलियां भी तैयार करने में सफलता हासिल कर ली है और उन्हें आशा है कि अगले छह महीनों में प्रयोगशालाओं और स्कूलों के लिए इनकी बिक्री शुरू हो जाएगी। मेंढकों की ही तरह पारदर्शी गोल्डफिश का भी धड़कता दिल बाहर से ही नजर आता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब काफी हद तक परीक्षणों के लिए उन्हें मारने की जरूरत नहीं पडे़गी। प्रयोगों के दौरान स्कूलों में ही बच्चों को मेंढक काटना पडता है जिसके चलते कई छात्र जीव विज्ञान विषय ही छोड़ देते हैं। यही नहीं पशु प्रेमी भी वर्षों से मेढकों के काटे जाने पर उंगलियां उठाते रहे हैं।
जापान की माय यूनीवर्सिटी के जीव विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर यूताका तमारू का कहना है कि पिगमेंट के न होने के कारण इस गोल्डफिश की त्वचा एकदम पारदर्शी है जिससे इसका न केवल धड़कता दिल धक-धक करता बाहर से ही साफ दिखाई देता है, बल्कि आंख के ऊपर दिमाग तथा अन्य अंग भी काम करते हुए देखे जा सकते हैं।
यूताका ने कहा कि अब वैज्ञानिकों को इनके अंगों पर परीक्षण करने के लिए उसका शरीर काटकर देखने की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि अधिकांश परिस्थतियों में अब उनके अंगों पर पड़ने वाले असर को बाहर से ही काम करते या उन पर परीक्षण के असर को बिना काटे ही देखा जा सकेगा। माय यूनिवर्सिटी तथा नगोया यूनिवर्सिटों के संयुक्त प्रयासों से तैयार ये 'राइकिन' नाम की यह गोल्डफिश करीब बीस साल तक जिन्दा रहेगी तथा इसकी लंबाई भी करीब दस इंच और वजन दो किलो तक बढा़या जा सकेगा।
हिरोशिमा यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक प्रोफेसर मासायूकी सुमीदा का कहना है कि अब इन पारदर्शी मेढकों का बडे़ पैमाने में उत्पादन शुरू कर दिया गया है और संभवतः इसी साल ये पारदर्शी मेंढ़क प्रयोग के लिए उपलब्ध हो सकेंगे। उन्होंने बताया कि अगले छह माह के भीतर ये मेंढक प्रयोगशालाओं तथा स्कूलों तक पहुंच जाएंगे। दस हजार येन यानी लगभग सवा पांच हजार रुपये के इस एक मेंढक को देश विदेश के लोग घरों में पालने के लिए भी खरीद सकेंगे। साभार www.livehindustan.com
प्रमाणपत्र 
उपर की दोनों खबरों से यह सिद्ध होता है कि यह प्रक्रिया जरूरी तो ही इस के लिए सवा  पांच हज़ार का मेंढक जिस संस्थान मे खरीद कर बच्चों को दिखाया जाएगा वहां कोई गरीब का बच्चा तो पढ़ नहीं सकता और यह सवा पांच हज़ार का मेंढक कितने वर्ष ज़िंदा रहेगा इतने पैसों मे 100 मेंढक आ सकते हैं और मेंढक पालको को रोज़गार भी मिलेगा अलग से क्यों जी ?

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विज्ञान पहेली -15 ........ Science Quiz -15
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यह  क्या है ? What is this ?
हिंट :- ३५ सालों तक लगातार प्रति वर्ष ६० एक की कीमत ४०० रूपये तो हुए ३५*६०*४०० = आठ लाख चालीस हज़ार रूपये वाह बेटा वाह यह बिजनेस पहले क्यूँ नहीं किया शुरू
पिताजी यह बिजनेस अभी आया है भारत मे .......
हेली का जवाब 23-5-2011, 8 बजे तक दे सकते है |
हेली का परिणाम 23-5-2011, 9 बजे |
प्रस्तुति :- सी.वी.रमन साइंस क्लब यमुना नगर हरियाणा
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Tuesday, May 10, 2011

विधुत मोटर का एक साधारण सा माडल Simplest Electric Motor

विधुत मोटर का एक साधारण सा माडल  Simplest Electric Motor
आज कक्षा सात के बच्चे अपने फ्री पीरियड में मेरे पास आये और बोले सर आप ने कहा था कि परीक्षाओं के बाद आप को मै एक विधुत मोटर का एक साधारण सा माडल बना कर दिखाऊंगा तो अब बना के बताओ,मैंने कहा जरूर पहले तुम बताओ कि आप ने मोटर कहाँ कहाँ देखी है स्कूल में सभी  बच्चे ग्रामीण परिवेश के होने के कारण एक बात मेरी समझ में यह आती है कि इन बच्चों  देखने के लिए कम चीज़े मिलने के कारण ये हर चीज़ को देखते हैं बड़े ही ध्यान से हैं, इनके आस पास सिमित दायरा और सिमित वस्तुएँ ही होती है जब कि शहरी परिवेश होने के कारण शहरी बच्चों को अपेक्षाकृत ज्यादा नईं नई वस्तुएँ देखने को मिलती है |
एक बच्चें ने बताया कि मै रोज घास काटने की मशीन की मोटर को देखता हूँ और नलके की मोटर को भी मुझे उनका चलना अच्छा लगता है.
बच्चों ने बताया विधुत मोटरें सी.डी.प्लेयर,आटा चक्की,ट्यूबवेल,घास काटने की मशीन,हैंडपम्प,दर्जी की सिलाई मशीन,दूध बिलोने की मशीन,पंखें,कूलर एक के बाद एक दनादन बताते चले गए.
जरूरी सामान एकत्र कर के जल्द ही बनाई गयी एक सिम्पल सी विद्युत मोटर.
यह क्यूँ  व कैसे बनी क्या सिद्धांत है इसमें किसी की कोई रूचि नहीं थी बस वो तो इस को घूमना देखना चाहते  थे और कक्षा सात के बच्चों को तो बस ये मतलब होता है कि कोई नयी चीज़ बनी है और अब वो भी बना कर देखेंगे.
पिछले कीलों के संतुलन वाले प्रयोग को लगभग सभी बच्चों बना और कर के देखा.
आवश्यक सामग्री : दो बेलनाकार चुम्बक,एक ताम्बे की तार,एक १.५ वोल्ट का शुष्क सेल.
अब  सेल को चुम्बकों के उपर खडा कर देते है और ताम्बे की तार का लूप बना कर सेल की पीतल की टोपी के उपर रख देते हैं नीचे से खुला तार का ह्रदयाकार लूप चुम्बकीय क्षेत्र में उत्त्पन्न बल से वृताकार घूमने लग जाता है और काफी देर तक घूमता रहता है
चुम्बक की धातु विधुत की सुचालक है और तार भी जब परिपथ पूरा होता है यानी तार का सिरा चुम्बक से स्पर्श करता है तो सामान ध्रुवों के प्रतिकर्षण के कारण वेह सिरा धकेला जता है और विपरीत ध्रुवों के आकर्षण के कारण दुसरा सिरा आकर्षित किया जाता है यह क्रिया बार बार दोहराई जाती है और लूप घूमने लगता है.
सब बच्चों ने ताली बजाई और जमूरा खुश हुआ,किसी बच्चे ने सामान ले लिया कि मै बना के देखता हूँ फिर सब बारी बारी बना कर देखेंगे, सीखेंगे तोड़ फोड़ कर सामान वापस कर देंगे.
अपना उद्देश्य सफल हा हा ....
बीज डालेंगे तभी तो पौधे उगेंगे,बनेंगे पेड़ फिर ही तो देंगे फल.
देखो यह चलचित्र  देसी है पर है तो अपना 



प्रस्तुति :- सी.वी.रमन साइंस क्लब यमुना नगर हरियाणा
द्वारा :-दर्शन बवेजा,विज्ञान अध्यापक,यमुना नगर,हरियाणा
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Saturday, May 07, 2011

विज्ञान पहेली-14 Science Quiz-14 (और Science Quiz-13 का उत्तर)

विज्ञान पहेली-14 Science Quiz-14 (और Science Quiz-13 का उत्तर)
बड़ी खुशी से सूचित किया जाता है की इस  पहेली -१३  के विजेता बने हैं,

Indranil Bhattacharjee ........"सैल"

आपको  बहुत बहुत बधाईयाँ …….
दूसरे  स्थान पर रहे श्री रजनीश कुमार तीसरे स्थान पर रहे श्री आशीष मिश्रा  
श्री राज भाटिया जी का भी धन्यवाद ...
आप सब को भी बधाईयां ...........
यह अणु यूरिया का है यूरिया के कृत्रिम निर्माण से पहले पूरी दुनिया में बर्जेलियस का सिद्धान्त माना जाता था कि कि यूरिया जैसे कार्बनिक यौगिक सजीवों के शरीर के बाहर बन ही नहीं सकते तथा इनको बनाने के लिए प्राण शक्ति की आवश्यकता होती है।यूरिया को सर्वप्रथम १७७३ में मूत्र में फ्रेंच वैज्ञानिक हिलेरी राउले ने मूत्र  में खोजा था परन्तु कृत्रिम विधि से सबसे पहले यूरिया बनाने का श्रेय जर्मन वैज्ञानिक  फ्रिएद्रीच वोहलर को जाता है।इन्होंने सिल्वर आइसोसाइनेट से यूरिया का निर्माण किया तथा स्वीडेन के वैज्ञानिक बर्जेलियस के एक पत्र लिखा कि मैंने बिना वृक्क (किडनी) की सहायता लिए कृत्रिम विधि से यूरिया बना लिया है। 
आज  यह माना जाता है कि क्रेग वेंटर John Craig Venter पहला वैज्ञानिक है जो ईश्वरीय शक्ति से खेला  Play with God और उस ने प्रयोगशाला में पहली कोशिका कृत्रिम रूप से बनाई इस से कईं साल पहले Play with God का कारनामा वैज्ञानिक  फ्रिएद्रीच वोहलर Friedrich Wöhler (31 July 1800 - 23 September 1882)  कर चुके थे |
यह  लेख पढ़ कर आप जान सकते हैं कि कौन है पहला वैज्ञानिक जो है इस खिताब का असली हकदार 
यूरिया का उपयोग मिट्टी की उर्वरा शक्ति बढ़ाने में होता है।  आज़ाद भारत में अब कृषि मे आत्मनिर्भरता बहुत बड़ी चुनोती थी इसके लिए भूमि का अधिक प्रयोग,सिंचाई के साधन,और उचित उर्वरकों की आवश्यकता थी इस लक्ष्य को पाने के लिए हरित क्रांति की मुहीम चलाई गयी तब देश के नेता लोग भी कुछ देश के बारे में सोचा करते थे और सेवक भी हुआ करते थे 
यूरिया ने देश की हरित क्रान्ति को कामयाब बनाने में बहुत योगदान दिया आज हम यह तो कह देते हैं कि रासायनिक खादे खतरनाक हैं परन्तु आज़ाद भारत के लोगो का पेट भरने के लिए आधुनिक कृषि को अपनाया जाना  जरूरी था |  
आज़ादी के समय मोटा आनाज ज्यादा उगाया जाता था क्यूंकि इस के लिए अधिक सिंचाई और ज्यादा कृषि क्रियाएँ आवश्यक नहीं थी मानसून का जुआ खेल कर किसान इसे उगा देता था गेहूं को अधिक नज़ाकतों की आवश्यकता थी आम जन मोटा अनाज खाता था और किसी खास मेहमान के आने पर बनती थी गेहूं कनक की रोटियां | जैसा कि इस पुराने पंजाबी गीत में स्पष्ट है कि कनक के मन्न यानी गेहूं की  रोटी की क्या खास बात थी |  
नहरों ,ट्यूबवेल,नया बीज,सघन खेती  यूरिया और किसानों की कमरतोड मेहनत ने गेहूं को सुलभ बना दिया | 

खैर अब है बारी विज्ञान पहेली -14 की
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विज्ञान पहेली -14 ........ Science Quiz -14
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यह क्या  है ? What is this ? 
हिंट  : कितना आवश्यक था यह काम  परन्तु अब  यह बंद हो गया   .....
हेली का जवाब 15-5-2011, 8 बजे तक दे सकते है |
हेली का परिणाम 15-5-2011, 9 बजे |
प्रस्तुति :- सी.वी.रमन साइंस क्लब यमुना नगर हरियाणा
द्वारा :-दर्शन बवेजा,विज्ञान अध्यापक,यमुना नगर,हरियाणा
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