Friday, August 15, 2014

बच्चे छोटे पर काम बड़े Science Exhibition

बच्चे छोटे पर काम बड़े Science Exhibition 
वाटर लिफ्टिंग 
 गत दिनों स्थानीय स्प्रिंग डेल्स पब्लिक स्कूल जगाधरी वर्कशाप मे आयोजित विज्ञान एवं आर्ट क्राफ्ट प्रदर्शनी को विशेष निमंत्रण पर  देखने के लिए जाने का अवसर मिला तो पाया कि अध्यापकों, अभिभावकों और स्कूल प्रशासन की बेहतरीन तालमेल के फलस्वरूप  कुछ भी ऐसा असंभव नहीं जो प्राप्त ना किया जा सके बस मेहनत और लगनशीलता होनी चाहिए
स्प्रिंग डेल्स पब्लिक स्कूल जगाधरी वर्कशाप एक निजी संचालित कक्षा सात तक का स्कूल है जो कि निरंतर प्रगति की और अग्रसर है और इस विद्यालय की प्रधानाचार्या अनीता सरदाना का कहना है कि उन्होंने एक खास उद्देश्य को लेकर इस स्कूल की शुरुवात की थी जिसमे कि गुणवतापूर्ण शिक्षा प्रदान करना एक मुख्य घटक था


नर्वस सिस्टम 
उन्होंने बताया कि वर्षों की अथक मेहनत के बाद उनका विद्यालय आज इस मुकाम पर है कि जिले मे प्राथमिक स्तर पर इतनी गतिविधियो को शामिल करके शिक्षा देने मे उनका कोई मुकाबला नहीं कर सकता। विज्ञान प्रदर्शनी, बाल विज्ञान कांग्रेस, विज्ञान प्रश्नोत्तरी, विज्ञान मेला, विज्ञान नाटक और सांस्कृतिक प्रस्तुतियाँ आर्ट एंड क्राफ्ट, रोबोट व प्रेक्टिकल कार्यशालाएं आदि प्रतियोगिताओं मे भाग लेकर स्कूल के विद्यार्थियों ने बेहतर प्रदर्शन किया है और पुरूस्कार भी जीते हैं। 
प्लांट सेल 


इस विज्ञान प्रदर्शनी का उद्घाटन जिला सुचना अधिकारी श्री रमेश गुप्ता और सरपंच श्री सेवा सिंह ने किया और इस अवसर पर उन्होंने पृथ्वी की सुरक्षा के संदेश का आवहान करता हाइड्रोजन गैस से भरा एक रंगबिरंगा गुब्बारों का गुच्छ भी आकाश मे छोड़ा और बाद मे उन्होंने एक एक प्रतिभागी के पास जाकर उसके विज्ञान माडलों के बारे मे पूछा और मुक्त कंठ से बच्चों और अध्यापकों की प्रशंसा की


अभिकेन्द्र बल Centripetal force को प्रदर्शित करता एक प्रयोग

एक बोर्ड पर चारों कोनों मे सुराख करके नाइलोन की रस्सी से बराबर बाँध लेते हैं केन्द्रीय गाँठ से उपर की रस्सी की लम्बाई अपने कद के मुताबिक़ रखते हैं और उस पर तीन चार पात्र पानी से भर कर रखते हैं


फिर इस को नियमित और सावधानी पूर्वक घुमाने से हम देखते हैं कि पानी के पात्र नहीं गिरते है ऐसा क्यों होता है इस को इस लिंक से जाने 


देखें इस बालक का ये प्रयोग करते हुए वीडियो 



विभिन्न प्रकार के पुलों के बारे मे बताता माडल 



अखबार मे 





             

Saturday, August 02, 2014

उज्जैन पहुंचे साइंस के मास्टर Ujaain the City of Kaal Ganna

उज्जैन पहुंचे साइंस के मास्टर Ujaain the City of Kaal Gnana
पृथ्वी की परिधि नापने यमुनानगर से उज्जैन पहुंचे साइंस मास्टर

देश-विदेश से खगोलविद आज भी स्टीक काल गणना के लिए उज्जैन आते है 

सी वी रमण विज्ञान क्लब सरोजिनी कालोनी के सदस्यों ने पृथ्वी की परिधि नापने के प्रयोग को और बेहतर तरीके से सम्पन्न करने के लिए कर्क रेखा पर स्थित नगरी उज्जैन का रुख किया।  अपने क्लब सदस्यों शिरीष शर्मा, अनिल गुप्ता व वीरेंद्र बजाज के साथ उज्जैन व डोंगला मे पृथ्वी की परिधि नापने का प्रयोग किया। यहाँ से प्राप्त आंकड़ों को मुंबई स्थित वासनजी एकेडमी विज्ञान क्लब के सदस्यों के आंकड़ों के मिला कर गणना के द्वारा पृथ्वी की परिधि ज्ञात की गयी। क्लब समन्वयक दर्शन लाल ने बताया कि इस प्रयोग के लिए स्टीक आंकड़े प्राप्त करने के लिए वह खुद व क्लब सदस्यों शिरीष शर्मा, अनिल गुप्ता व वीरेंद्र बजाज के साथ उज्जैन की जीवाजी वेधशाला व काल गणना वेधशाला डोंगला गए, वहां उन्होंने 20 व 21 जून को कर्क रेखा पर स्थित तीन अलग अलग जगह प्रयोग करके प्रेक्षण लिए। जीवाजी जंतर मंतर वेधशाला उज्जैन और भारतीय काल गणना केन्द्र पद्म श्री डा विष्णु श्रीधर वाकणकर वेधशाला डोंगला तहसील महिदपुर जिला उज्जैन के प्रेक्षण और यमुनानगर व मुंबई  के प्रेक्षण से प्राप्त रीडिंग  को सूत्रों में प्रतिस्थापित करके पृथ्वी की परिधि इरेटोस्थनीज़ विधि से पृथ्वी की परिधि ज्ञात की गयी।

क्या है विधि?
विज्ञान अध्यापक दर्शन लाल बवेजा ने बताया कि इस प्रयोग के लिए सबसे पहले दो स्थानों का चयन किया जाता है, उन दो स्थानों में यदि एक स्थान ऐसा है जो कि कर्क रेखा स्थित पर है। २१ जून को जिस समय वहां शंकु यंत्र (नोमोन) की परछाई शून्य हो जाती है तो उस समय वहाँ सूर्य का उन्नयन शून्य प्राप्त होगा। उसी समयांतराल में यह प्रयोग दूसरी युग्म टीम किसी दूसरे स्थान पर कर रही होती है जो की कर्क रेखा से अच्छी खासी अक्षांशीय दूरी पर हो। दोनों टीमों के न्यूनतम परछाई से प्राप्त उन्नयन कोणों के अंतर को सूत्र में दोनों स्थानों के बीच अक्षांशीय दूरी के साथ प्रतिस्थापित किये जाने पर गणितीय हल से पृथ्वी की परिधि ज्ञात हो जाती है। इस तरह से प्राप्त परिणाम की पृथ्वी की मानक परिधि के साथ तुलना करके त्रुटि ज्ञात की जाती है जितनी कम त्रुटि होगी उतना ही स्टीक परिणाम माना जाएगा। पृथ्वी की परिधि का स्टैंडर्ड मान 40075 किलोमीटर है।

कौन कौन शामिल हुआ इस प्रयोग मे 
इस प्रयोग मे उज्जैन व डोंगला मे क्लब सदस्य शिरीष शर्मा, अनिल गुप्ता व वीरेंद्र बजाज ने दर्शन लाल के नेतृत्व मे कमान संभाली जबकि मुंबई मे वासन जी एकेडमी विज्ञान क्लब के समन्वयक विशाल जे सावंत ने अपनी टीम के साथ यह प्रयोग ठीक उसी समयांतराल पर किया और यमुनानगर मे क्लब सदस्यों अमन, आंचल, पारस, अभिजात व पार्थवी ने प्रयोग को अंजाम दिया।
 
क्या है लाभ?
क्लब प्रवक्ता अनिल गुप्ता व शिरीष शर्मा बेंजवाल ने बताया कि आधुनिक विज्ञान ने भौतिकवाद को बढ़ाया है सभी शिक्षक अपनी जिम्मेदारी को समझें आधुनिक विज्ञान एवं देशज विज्ञान खगोल के प्रति विद्यार्थियों को शिक्षित करें। भारत में हर एक क्षेत्र में असीमित विविधितायें है। इस विशाल विविधता के मध्य भारत की एकता समझने योग्य है। यहां सबको एक इकाई से जोड़ने वाले अनेक सूत्र हैं। यही भावना बच्चों के कोमल मन में भरी जानी चाहिए। बच्चों को उनके आसपास उपलब्ध वनस्पतियों व जीवों और प्राकृतिक व खगोलीय घटनाओं की जानकारी स्थानीय भाषाओं की प्रयोगों के माध्यम से दी जानी चाहिए और उनमे उनके संरक्षण व प्रचार को मुख्य तौर पर रेखांकित किया जाना चाहिए।
मनुष्य को अपने प्राचीन विज्ञान को नहीं भूलना चाहिए क्योंकि प्राचीन काल में ऋषि-मुनियों व खगोलविदों ने साधनों के आभाव में वर्षों के प्रायोगिक अनुभव से काल गणना करना सीखा और समस्त विश्व को भी सिखाया यदि ऐसा है तभी तो विदेशों से खगोलविद आज भी स्टीक काल गणना के लिए उज्जैन आते है। इस बार भी इस दुर्लभ दृश्य के गवाह बनने के लिए देश भर के खगोल वैज्ञानिकों के साथ आम लोग भी उज्जैन जिले के इस छोटे-से गांव डोंगला में उमड़ पड़े।  22 जून से सूर्य सायन कर्क राशि में प्रवेश करके दक्षिण की ओर गति करना प्रारंभ कर देगा। ज्योतिष शास्त्र की जुबान में इसे सूर्य का दक्षिणायन होना कहा जाता है। इसके बाद रात के मुकाबले दिन लगातार छोटे होते जाते हैं। मध्यप्रदेश पर्यटन विभाग करोडो रुपयों की लागत से उज्जैन जिले में कर्क रेखा पर भारतीय काल गणना केन्द्र पद्म श्री डा विष्णु श्रीधर वाकणकर वेधशाला व शोधकेन्द्र का निर्माण करवा रहा है। यहीं पर कोणार्क सूर्य मंदिर की तर्ज पर विशाल सूर्य मंदिर निर्माण का प्रस्ताव भी है। दोनों के बन जाने पर उज्जैन जिला विश्व के नक़्शे पर एक और कुम्भ मेले ‘खगोलविदो का कुम्भ’ के लिए विश्वविख्यात हो जाएगा।
साल में चार बार इस प्रयोग से पृथ्वी की परिधि ज्ञात करके बच्चे बहुत ही लाभान्वित होते हैं और शुद्ध देसी काल गणना विधि के ज्ञान पाकर लाभान्वित होते हैं साथ ही उनके मन में प्राचीन भारतीय विज्ञान के प्रति सम्मान व जिज्ञासा उत्पन्न होती है।
अखबार मे 







Sunday, June 08, 2014

लैंगिक, बाल अधिकार व सामाजिक संवेदीकरण पर क्षेत्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला Regional Training of Trainers Programme–for School Teachers

लैंगिक, बाल अधिकार व सामाजिक संवेदीकरण पर क्षेत्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला सम्पन्न

चंडीगढ़ मे आयोजित क्षेत्रीय कार्यशाला मे भाग लेते विभिन्न राज्यों के अध्यापक
लैंगिक समानता, बाल अधिकार और सामाजिक संवेदीकरण पर पांच दिवसीय क्षेत्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन सामाजकल्याण विभाग चंडीगढ़ प्रशासन, राज्य महिला संसाधन केन्द्र के सयुंक्त तत्वाधान मे दो से छह जून तक सीनियर सिटीजन होम सेक्टर 43 मे आयोजित किया गया जिसमे हरियाणा के पांच जिलो से दो-दो अध्यापकों का चयन इस ट्रेनिग के लिए किया गया था। यमुनानगर जिले से भी जिला मौलिक शिक्षा अधिकारी आनंद चौधरी और सहायक परियोजना अधिकारी सर्व शिक्षा अभियान डाक्टर धर्मवीर सिंह ने  दो विज्ञान अध्यापकों दर्शन लाल बवेजा और खेम लाल सैनी का चयन इस कार्यशाला मे जिले की तरफ से भाग लेने के लिए किया था। क्षेत्रीय प्रशिक्षण कार्यशाला समापन के बाद दोनों अध्यापकों ने बताया कि इस प्रशिक्षण कार्यशाला मे पंजाब, हरियाणा, हिमाचल, चंडीगढ़ के अध्यापक, शिक्षा अधिकारियों और  स्थानीय बाल कल्याण अधिकारियों को विभिन्न विश्वविद्यालयों,  मेडिकल कालेज, आइपीएस प्रशिक्षण केन्द्र और विधि कालेज व अन्य अनेक संस्थानों से आमंत्रित रिसोर्स पर्सन्स ने व्याख्यान, रोल प्ले व प्रयोगात्मक समूह चर्चा के माध्यम से प्रशिक्षित किया।

प्रतिभागी 
चंडीगढ़ समाज कल्याण विभाग के निदेशक श्री राजेश जोगपाल के मार्गदर्शन व राज्य संयोजक प्रभजोत कोर अटवाल के कुशल निर्देशन मे पांच दिनों तक प्रशिक्षणार्थियों को भारतीय समाज में लैंगिक व जातिगत विभाजनकारी कारकों, लैंगिक विषयों की समझ के कारकों, जीवन कौशल की अवधारणा, महिलायें और नशे का प्रयोग, भारत मे किशोरवस्था की चिंतनीय जरूरते और वास्तविकता, शिक्षण सहभागी क्रियाओं व थियेटर का योगदान, बच्चों मे मादक व नशीली दवाओं के प्रयोग, लैंगिक जागरूकता संचार मे अभिभावकों व अध्यापकों का योगदान, बच्चों और शिक्षाविदों के लिए साइबर दुनिया एक बड़ा खतरा, एचाईवी-एड्स संचरण व रोकथाम, परीक्षण परामर्श और गोपनीयता सेवायें, महिलाओं बच्चों व दलित वर्गों के प्रति अपराधों हेतु सवैंधानिक प्रावधान, बाल केंद्रित क़ानून, महिला केंद्रित क़ानून, बच्चों का अवैध व्यापार, किराए की कोख, बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया, अंतर्जाल के माध्यम से गुमशुदा बच्चे की तलाश करने की विधि और भावनात्मक बुद्धिमत्ता आदि जैसे विषयों पर व्याख्यान दिए गए और प्रशिक्षणार्थियों के टेस्ट भी लिये गये।

मुख्य वक्ताओं के रूप मे डाक्टर रवनीत चावला, डीआर नेगी, डाक्टर विनीता भार्गव, प्रोफेसर अभिनंदन बस्सी, प्रोफेसर संजय वाडवाल्कर, बिस्मान आहूजा, संजीव गुलाटी, डाक्टर विनीता गुप्ता, जितेन्द्र दहिया, गुरचरन सिंह, तेज मैग्जीन, डाक्टर गौरव गौड़, जुल्फिकार खान, प्रोफेसर(डाक्टर) बी एस चवन, नील रोबर्ट, कर्नल रवि बेदी, प्रोफेसर मानविंदर कौर, डाक्टर रौनकी राम आदि विशेषज्ञ संसाधन पर्सन्स ने भाग लिया। 
मुख्य बिंदु 
* प्रशिक्षण की प्लानिंग और संसाधन व्यक्तियों की योग्यता प्रशंसनीय थी 
* आयोजको के बीच समन्वय सराहनीय रहा 
* साइबर क्राइम पर श्री गुरुचरन सिंह व कानूनी जानकारियों पर शुश्री अभिनन्दन बस्सी और चाइल्ड ट्रेफिकिंग, सेरोगेसी व बच्चा गोद लेना विषयों पर डा० विनीता भार्गव का व्याख्यान अत्याधिक रुचिकर व ज्ञानवर्धक रहा 
* आयोजन स्थल, भोजन व स्वागत उम्दा था 
* आयोजको का व्यवहार सहयोगी था 
*खास बात प्रतिभागियों के चयन के अध्यापकों के साथ साथ अन्य सम्बंधित कर्मचारियों को भी शामिल करना दूरदर्शिता पूर्ण प्रयास था
*समूह चर्चा विधि और विश्व पर्यावरण दिवस पर चिंतन प्रसंसनीय प्रयास थे 
* आयोजन स्थल पर रेजिडेंट सीनियर सिटीजन से बातचीत व अनुभवो का श्रवण अच्छा लगा 
* प्रशिक्षण किट व डाक्यूमेंटेशन सीडी बहुत अच्छी है 
* प्रशिक्षण के दौरान प्राप्त प्रमाणपत्र व अर्जित ज्ञान प्रतिभागियों के लिए  सदैव अमूल्य रहेंगे
* भविष्य मे विभाग यदि सभी प्रशिक्षणार्थियों को नए परिवर्तनों और नव जानकारियों से यदि अद्यतन(अपडेट) करे तो वह  सराहनीय प्रयास होगा 

एक प्रतिभागी कि कलम से 
दर्शन लाल बवेजा 
विज्ञान अध्यापक 
यमुनानगर  



Tuesday, April 29, 2014

अंधविश्वास निवारण में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी Miracle vs Science


अंधविश्वास निवारण में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी Miracle vs Science
अंधविश्वास एक वैश्विक समस्या है। सभी देशों व उन के नागरिकों को विभिन्न प्रकार के अंधविश्वासों और जादू-टोना आदि से जूझना पड़ता है। अंधविश्वासों का प्रचलन केवल एशियाई देशों ही नहीं बल्कि विकसित कहे जाने वाले यूरोपीय देशों में भी है। बात यदि भारतीय परिप्रेक्ष्य में की जाए तो बहु धर्म, मत, सम्प्रदाय के अलग-अलग देवों व पूजा-पद्धतियों के चलते यहाँ बाबा, सयाना, तांत्रिक, पीर, मियाँ जी, अवतार, देवाजी, गंडा-ताबीज, बंध  सम्मोहन, वशीकरण, टोना-टोटका, मजार, तालाब-कुंड, झाड़-फूँक आदि बहुत सी बुराइयाँ सर्वव्याप्त हैं। बहुधा देखा गया है कि कई बार कई अंधविश्वास धर्म का अंग न होने के बावजूद ढोंगी लोगों द्वारा प्रचारित कर दिये जाते हैं। शहरों की अपेक्षाकृत गाँव-कस्बों में इस तरह की बहुत सी बुराइयाँ अधिक प्रचलित हैं जो जनता को अपने मोहपाश में फाँस कर उनका सर्वस्व नाश करने में लगी हैं। विभिन्न मामलों के अध्ययन (केस स्टडी) के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला गया है कि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के प्रयोग से आज के समाज में काफी हद तक जागरुकता आयी है। यदाकदा मामलों को छोड़ कर लोगों की समझ और विमर्श बढ़ा है परन्तु मीडिया की भूमिका जहाँ आज पूर्ण वैज्ञानिक होनी चाहिए थी व्यवसायिकता के चलते उसकी भूमिका अंधविश्वास निवारण के क्षेत्र में संदिग्ध है। कभी तो मीडिया बुनियादी विज्ञान को देवी-देवता से जोड़ता प्रतीत होता है और कभी अंधविश्वासों की वैज्ञानिक व्याख्या करता नहीं थकता। बल्कि कई मामलों में मीडिया अपनी रेटिंग बढ़ाने के लिये अंधविश्वास के मामलों का प्रचार करता ही दिखता है।
सन्तोष की बात है कि वैज्ञानिक चेतना के प्रसार से अंधविश्वास को मामलों में हालिया वर्षों में काफी कमी आयी है। अब कोई किसी के नाम की हांडी नहीं छोड़ता है और ना ही आनुवांशिक विकार के साथ पैदा हुए मानव या पशु बच्चे को अवतार की संज्ञा दी जाती है। ग्रामीण क्षेत्र में जागरुकता का संचार इस बात से साबित होता है कि अब पीलिया का रोगी या साँप का काटा आदमी झाड़-फूँक वाले के पास ना जाकर डॉक्टर के पास पहले जाता है। पुराने समय में ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षरता एवं स्वास्थ्य सेवाओं का अभाव भी अंधविश्वासों के प्रचलन का एक मुख्य कारण था। इन सेवाओं की ग्रामीण क्षेत्रों में पहुँच होने से अंधविश्वासों में कमी आयी है। इस लेख में बहुत से उदाहरणों से और स्वयं सुलझाए गए मामलों के नतीजों से साबित होता है कि अब कोई ढकोसला अधिक लंबा नहीं चल सकता, चाहे मंद गति से ही सही विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी ने बहुत सी भ्रांतियाँ मानव मन से मिटा दी हैं
लंबी गुलामी और थोपे गये विदेशी विचार वास्तव में मूल भारतीय संस्कृति के संहारक बने और हमारी मूल परम्पराओं का ह्रास होता गया और हम गहरे अंधविश्वासों में फँसते चले गए। देश के आजाद होने से पूर्व सोचा गया था कि पहले हम आजाद हो लें, आजाद हुए तो भूख-गरीबी समाप्त करने और आंतरिक राजनीतिक कलह, युद्ध, बटवारे और पूर्व गुलाम मानसिकता ने मजबूती से जकड़े रखा। सरकारों ने अपने स्तर पर प्रयास किया तो जनसंख्या की आँधी सर्वनाश करती चली गई। आजाद भारत में इस प्रकार की सोच बन गयी कि जो अधिक होंगे उनका ही राज़ होगा। खैर सभी को अपनी विचार प्रकट करने की आजादी और आजाद फिजा में तरक्की की लहर चल पड़ी। सड़कें, यातायात, चिकित्सा, शिक्षा, व्यापार, न्याय और धर्म की आजादी आम जनता को और बढ़ता पूँजीवाद आपसी घमासान के साथ बम्बैया मनोरंजन के साथ-साथ आनन्दित हो अग्रसर होता रहा। विज्ञान व प्रौद्योगिकी का महत्व लोग समझने लगे थे विज्ञान के क्षेत्र में नित नए साधनों का प्रयोग एक चमत्कार के रूप में प्रचलित अंधविश्वासों को समझने में कारगर सिद्ध हो रहा था। ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत का पहुँचना और विद्युत बल्ब का जगमगाना बहुत से अंधविश्वासों को यकायक डकार गया। अँधेरे में किया जाने वाला चमत्कार बिजली की चमक में उजागर हो गया।
यातायात के साधन को विकास के दौर की सबसे बड़ी देन समझा जा सकता है। दूरदराज के गाँवों में बारात व तीर्थयात्रा  के अवसर पर ही गाँव से बाहर निकलने वाला ग्रामीण अब दूर-दूर की यात्राएँ करने लगा। अपने साथ वो वैज्ञानिक विचार और अंधविश्वास निवारण जागरुकता भी लाने लगा। आजादी के संघर्ष से खाली हुए कार्यकर्ता भी कुछ राजनीति से प्रेरित और कुछ आजादी के बाद के तीव्र परिवर्तनों से प्रभावित होकर जागरुकता के संचार के लिए अपने-अपने स्तर पर दूरदराज के क्षेत्रों में निकल पड़े। विज्ञान व प्रौद्योगिकी की बहुत बड़ी देन सिनेमा, भोंपू रेडियो और मंडलियाँ अंधविश्वास निवारण में अग्रसर हुई।
देश में तेजी से विकास की लहर दिखाई दे रही थी। अब हरित क्रांति सिंचाई के साधनों से सज कर थाली तक भोजन परोसने में कामयाब होती जा रही थी। असल में आजाद देश की भयमुक्त प्रजा उत्साह से जागरुक हो रही थी। आम आदमी को भी अब विद्यालय जाने का अवसर देकर सरकारें उनके लिए भी रोजगार का समान अवसर जुटा रही थी। पटवारी की नौकरी को ही सबसे बड़ी नौकरी मानने वाला आम ग्रामीण कमाने खाने के लायक बन रहा था। जमीदार और पूँजीवादी भी काम के बदले दाम दिए जाने के सच को समझ रहा था कि अब वो दिन लद चुके जब बेगार ली जाती थी। इस समझ के विकसित होते ही बहुत बड़ा वर्ग अपने आप को सुरक्षित महसूस करने लगा था।
शिक्षा और वैज्ञानिक चेतना का सबसे बड़ा प्रभाव प्रचलित कुरीतियों पर पड़ा। शिक्षित वर्ग धर्म-सम्प्रदाय से तो मुक्त नहीं हो पाया परन्तु अंधविश्वासों और आडम्बरों का विरोध करने लगा। कहते हैं कि “सुधारवादी प्रक्रिया तेजी से बढ़ती है और गहरा असर छोड़ती है, उसका मुजायरा बेशक दबी आवाज में होता है लेकिन असरकारक होता है”। आडम्बरियों के पैर इतने मजबूत नहीं होते हैं कि वो विरोध की आवाज से जमे रहें, वो विरोध में जल्द ही उखड़ जाते हैं। उदाहरण के तौर पर गत 30-35 वर्षों में जमीन से मूर्तियाँ निकलना और सपने आने पर डेरे या मंदिर-मजार बनाना यकायक कम हो गया है। इसका कारण वैज्ञानिक चेतना और जागरुकता का संचार ही तो है।
प्रचलित टोने-टोटके व अंधविश्वास व उनकी मान्यताएँ
जनमानस के अनुभव सांझा करने व बातचीत  के दौरान बहुत से प्रचलित टोने-टोटके व अंधविश्वास पता चले जो कि आजादी पूर्व तथा 70 के दशक तक विद्यमान थे परन्तु समय के साथ-साथ विलुप्त होते चले गए और वर्तमान में उन का अस्तित्व ही नहीं बचा है। अब अगर ऐसी (निम्न वर्णित) घटनाएँ यदा-कदा होती भी हैं तो कोई विश्वास नहीं करता और यदि करे तो जल्द ही भांडाफोड़ हो जाता है। 
किसी को मारने के लिए या मौत से भयभीत करने के लिए अमुक के नाम की हांडी छोड़ना।
घर में खून के छींटे पड़ना।
घर के आँगन में कंकड़-बजरी की बौछार पड़ना।
घर के आँगन में सिक्के मिलना।
ट्रंक में पड़े कपड़े जलना।
खलिहान में कृषि उत्पाद का जल जाना।
गुहारे में उपले जल जाना।
पानी लाँघ जाना।
मनुष्य पशुओं के बच्चों, गाजर-मूली, पेड़-पौधों का देवी-देवता जैसे शक्ल के साथ पैदा होना।
जटायु के बच्चे पैदा होना।
जमीन से मूर्ति निकलना।
समाधि से जिंदा निकलना।
मरने के बाद अर्थी या चिता से जीवित उठ जाना।
पूर्व जन्म की बातें याद होना।
किसी की प्रेतात्मा प्रवेश कर जाना।
बीमार होने पर झाड़-फूँक करवाना।
बिना आग के चावल पकाना।
हल्दी के पानी का खून बना देना।
हवनकुंड में अग्निदेवता को प्रकट करना।
बिना चीरफाड़ किये पथरी निकालना।
कुएँ के जल को मीठा कर देना।
कपड़े पर देवी के चरण छपना।
धन को दुगना कर देना।
बंधा-वशीकरण करना।
महुए के पेड़ के नीचे हाथ-पाँव का फिसलना।
रात्रि में मंदिर में रखे प्रसाद का जूठा हो जाना।
नरबलि या पशु की बलि देना।
नारियल फोड़ने पर खून या पुष्प निकलना।
खेत में से हड्डियाँ या प्राचीन सिक्के निकलना।
शमशान से चमक का दिखाई देना।
सफेद दाग व सिरोसिस का जल के छीटों से ठीक हो जाना। 
इन सब के अलावा बीमारी, शादी ना होना, फसल अच्छी होना, पशुओं का बीमार होना, बच्चे पैदा ना होना, सामान खो जाना, मकान ना होना, सिर्फ लडकियाँ ही पैदा होना, खास उम्र तक आते-आते बच्चों का मर जाना, गड़ा धन प्राप्त करना, वशीकरण करना, प्यार में असफलता, पराई स्त्री पर आसक्त होना, पढ़ाई लिखाई में अव्वल आना, पशु खो जाना, सोना खो जाना, दौरे पड़ना आदि खास मुद्दों के लिए खास बाबा, सयाना, तांत्रिक, पीर, मियाँ जी, अवतार, देवाजी आदि हर गाँव में या फिर आस-पास के गाँवों में मौजूद हुआ करते थे।
आस पास के दस गाँवों का सर्वेक्षण करने पर पता चला कि फलाँ किस्म के लोग हुआ तो करते थे परन्तु अब नहीं हैं, वो शहर चले गए हैं। शहर चले गए हैं कहने से तात्पर्य ये है कि कहीं और चले गए हैं या धंधा बदल गए हैं। जागरुकता के कारण ही शायद उन का कारोबार जो कि पूर्णत अंधविश्वास के आधार पर ही जारी था, धीरे-धीरे समाप्त होता चला गया। कुछ आर्थिक रूप से सक्षम बाबे-मौलवी अपना डेरा बना कर बड़े स्तर पर भी कार्यरत हैं बातों-बातों में पता चला कि एक बड़ा ओहदेदार बाबा नजदीक के कस्बे में बहुत बड़ा डेरा बनाकर आज भी कार्यरत है और उस के पास लोग विदेश जाने के लिए वीजा लगवाने सम्बन्धित टोने-टोटके के लिए जाते हैं। अधिक खोजबीन के बाद पता चला कि अपने पुत्र, पुत्रवधू आदि को विदेश में भेजने के दौरान उस को विदेश भेजने सम्बन्धित सारी औपचारिक्ताओं  का पता चल गया था जिस का लाभ उठाते हुए बाबा एकदम सही-सही तुक्के लगाता और कल आने को कह कर समस्या सम्बन्धित निवारण सलाहकार एजेंटों से सलाह करके बता देता है जो की सही निकलती है। वो बाबा गम्भीर मामलों में दर्याफ्ती को उन एजेंटों के पास जाने की सलाह देता है जो उन का काम करवा देते है और बाबा जी को भी मोटी रकम दलाली में मिलती है। इस कारण आज वो बाबा इलाके में विदेश भेजने वाले वीजा बाबा के नाम से विख्यात है।
अंधविश्वासों की उत्तरजीविता के कारण
हमारी विज्ञान की पाठ्य पुस्तकें यदाकदा अंधविश्वासों की व्याख्या तो करती हैं परन्तु आंशिक तौर पर ही। इस लेखन पर खास तवज्जो की आवश्यकता है। हमारा देश विज्ञान लेखन में भी पिछड़ा हुआ है। आज वैज्ञानिक शब्दावली और अभिव्यक्तियों की दृष्टि से हिंदी अत्यंत समृद्ध है। फिर भी आज वैज्ञानिक विषयों पर हिंदी में लेखन बहुत ही कम और अपर्याप्त है। इसका कारण भाषा की अशक्तता कदापि नहीं है बल्कि वैज्ञानिकों का इस दिशा में रुझान न होना ही हमारी विज्ञान लेखन की इस दरिद्रता का कारण बना हुआ है। अशक्त व हीन विज्ञान लेखन यदाकदा जादू टोने से शुरु होता है, उस की सत्ता को ही प्रचारित करता हुआ अंतिम क्षणों में उसका खंडन तो करता है परन्तु विज्ञान व तार्किक सोच का मजबूत पक्ष नहीं रख पाता। पूर्णतया वैज्ञानिक कल्पना का अभाव है क्योंकि वैज्ञानिक अभी विज्ञान लेखन अपनाने से कतराते हैं या वंचित है। इस कारण आम साहित्यिक हिंदी लेखक अच्छी सम्भावना और धनार्जन हेतु इस तरह के विज्ञान लेखन में अपने हाथ आजमा लेते हैं और वो भी जादू-टोने के खंडन व भूत प्रेत कथाओं से उपर उठ ही नहीं पाते। पथभ्रमित होते हुए उन के लेख खंडन की जगह प्रचार करते ही प्रतीत होते हैं। जैसा कि कहा जाता है, भारत ऐसा देश है जो संपन्न होते हुए भी दरिद्र है। वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में भी यही बात सच है। इसका निराकरण तभी संभव है जब एक तो, शिक्षा के माध्यम के रूप में भारतीय भाषाओं को अपनाया जाय तथा दूसरे वैज्ञानिकों को हिंदी में बोलने और लिखने के लिए प्रेरित किया जाए। विज्ञान लेखन की भयंकर कमी होने के कारण गत तीन दशकों में आम लोगो के हाथों में विज्ञान लेखन आंशिक रूप से ही पहुँचा है जबकि अखबारों व रसालों के द्वारा अंधविश्वास प्रेरक सामग्री अधिक पहुँची है।
समाज से अंधविश्वासों, टोने-टोटकों, गंडा-ताबीज पूच्छा आदि के पूर्णतः समाप्त ना हो सकने का कारण जनसंख्या का अधिक होना भी है। काम-धंधे रोजगार के अधिक अवसर ना होने के कारण अधिकाँश लोग लघु मार्ग से अमीर बनना चाहते हैं और फिर वो इस प्रकार के मार्गों की तलाश में निकलते हैं जिसका अंत अपराध पर समाप्त होता है। अधिकाँश एन॰जी॰ओ॰ भी गैर जिम्मेदार हैं जो इस से सम्बन्धित धन लेकर भी इस संदर्भ में पूर्णतया ईमानदार नहीं हैं।
घर-परिवार में सभी सदस्यों के शैक्षिक स्तर में बड़ा अंतर है। समस्या के आने पर कभी अशिक्षा शिक्षित सदस्य पर हावी हो जाती है और कभी शिक्षा जीत जाती है। अभी भी विचारों, उम्र और शिक्षा स्तर में गम्भीर अंतर है जो कि नवचेतना के मार्ग में बाधक है।
एक तरफ जहाँ मीडिया ने इन अंधविश्वासों को समाप्त करने में मदद की थी आज नए व्यवसायी चैनल इन अंधविश्वासों को नित नए तरीकों से प्रस्तुत कर रहे हैं परन्तु यहाँ एक बात काबिले गौर है। निर्मल बाबा के संदर्भ में पहले मिडिया उन को खूब उठाया और बाबा से इस काम का पैसा लिया और फिर बाबा को ठिकाने भी लगा दिया और एकदम सब चुप भी कर गए। निर्मल बाबा के प्रकरण में मीडिया की भूमिका संदिग्ध रही।
अंधविश्वासी किस्सों और अनुभवों का हस्तान्तरण, किस्से-कहानियाँ, रीति-रिवाज, व्रत-त्यौहार, पीर-औलिये, डेरे-मजार, धर्मप्रचार आदि कारक समाज के अंधविश्वास से पूर्णतया मुक्त होने में रुकावट हैं।
अन्धविश्वास निवारण में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का योगदान
सर्वेक्षण के दौरान गाँव अलाहर में बारह वर्ष से सत्तर वर्ष तक की उम्र के पुरुषों से विभिन्न टोने-टोटके व अंधविश्वास सम्बन्धी अनुभव साँझे किये गए और वर्तमान में इनके पहले जितने प्रचलित ना होने के कारण पूछे गए तो निम्न तथ्य सामने आये। पता लगा कि सबसे अधिक भयभीत करने वाला कारनामा था हांडी छोड़ना, यदि रात में कोई हांडी देख लेता था तो अपनी मौत को निकट ही समझता था। बुजुर्गों ने बताया कि गाँवों में बिजली आने से अब हांडी छोड़ने की घटनाएँ नहीं होती हैं। युवाओं ने इस घटना के बारे में अनभिज्ञता तो प्रकट नही की और यह कहा कि सुना तो है ऐसा होता था परन्तु देखा कभी भी नहीं, जबकि बालकों ने कहा ऐसा नहीं हो सकता हांडी हवा में खुद नहीं तैर सकती जरूर उसे कोई बाँस पर बाँध कर भागता होगा।
वैज्ञानिक चेतना, टी॰ वी॰ रेडियो कार्यक्रम, नाटक, सीरियल-ड्रामा, चमत्कारों का पर्दाफाश, तर्कशील सोसायटी के कार्यक्रम, अखबार-मैगजीन, कम्प्यूटर, इंटरनेट, विज्ञान ब्लॉग, मोबाइल फोन, नुक्कड़ नाटक, तमाशा, विज्ञान जत्था, नवचेतना रैली, विज्ञान क्लब गतिविधियाँ, नव जागरण पंथ, सत्संग कमेटियाँ, आर्य समाज सम्मेलन, उच्च शिक्षा प्राप्त नागरिक आदि गाँव से अंधविश्वास, जादू-टोने,  झाड़-फूँक आदि कुरीतियों को हटाने में सहायक कारक बने।
ग्रामीण क्षेत्रों में अन्धविश्वास निवारण के लिए सुझाव
गाँव के विद्यालयों में छात्रों और अध्यापकों के लिए अंधविश्वास निवारण की विशेष प्रशिक्षण कार्यशालाएँ लगाई जायें।
विज्ञान के पाठ्यक्रम में ‘अंधविश्वास और उन का निवारण’ नामक अध्याय छठी से दसवीं कक्षा तक जोड़ा जाए जिसमें स्थानीय उदाहरणों का भी हवाला दिया जाए।
विशेष विज्ञान नवचेतना जत्थे देश भ्रमण पर निकाले जायें।
सरकारें सज्ञान लेते हुए देश में कार्यरत तर्कशील सरीखी संस्थाओं को आर्थिक सहायता प्रदान करें और उनको ग्रामीण क्षेत्रों में काम करने के लिये प्रेरित करें।
नागरिकों को राष्ट्रीय वैज्ञानिक जागरण व विशेष अंधविश्वास निवारण बहादुरी पुरस्कार दिये जायें।
गाँवों में प्रति माह विशेष परामर्श अधिकारी भेजे जायें जो इन मामलों के अनुभवी हों।
अखबारों में अंधविश्वास फैलाने वाले व भ्रमित करने वाले मौलवियों, सयानों, तांत्रिकों, बाबों आदि के विज्ञापन पूर्ण रूप से प्रतिबंधित किये जायें।
डेरों, आश्रमों, मजारों व दरगाहों की गतिविधियों पर विशेष नजर रखी जाए।
उपभोक्ता वस्तुओं के विज्ञापन गैरचमत्कारी हों अर्थार् उन में किसी चमत्कार हो जाने की बात ना कही जाए जैसे तीस दिन में कद बढ़ जाना, दो सप्ताह में वजन कम हो जाना आदि।
प्रत्येक ग्रामीण स्कूल में एक खगोलीय दूरदर्शी दी जाए ताकि विद्यार्थियों को खगोलीय पिंडों की वैज्ञानिक   जानकारी देकर उनको तथाकथित ग्रह चाल, ग्रह दशा व राशिफल आदि के भय से मुक्त किया जा सके।
उच्च स्तर के वैज्ञानिक लेख, विज्ञान कथाएँ आदि अखबारों व पत्र-पत्रिकाओं में साप्ताहिक या मासिक रूप से प्रकाशित करना प्रकाशकों के लिए अनिवार्य किया जाय।
किसी भी घटना-दुर्घटना या चालाकी को चमत्कार के रूप में प्रचारित करने संस्था या कम्पनी को दण्डित किया जाए।
यदि हमारे गाँव और दूरस्थ आबादियाँ अंधविश्वास और चमत्कारों से मुक्त रहेंगे तो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी का यह वरदान देश की तरक्की में सहायक होगा
दर्शन लाल बवेजा 
विज्ञान संचारक
सचिव सी वी रमन विज्ञान क्लब, विपनेट क्लब यमुनानगर 
विज्ञान अध्यापक
राजकीय वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय अलाहर, यमुनानगर हरियाणा पिन १३५१३३





Sunday, March 02, 2014

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर कार्यक्रम National Science Day Celebrations

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस National Science Day Celebrations 
राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर आज विज्ञानी सी वी रमन को किया याद 
‘वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा’  है इस साल राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की थीम 

राष्ट्रीय विज्ञान दिवस पर इस वर्ष दीनबंधु छोटू राम विज्ञान एवं तकनीकी विश्वविद्यालय मुरथल हरियाणा जिला सोनीपत मे भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। हरियाणा विज्ञान मंच के निमंत्रण पर क्लब की तरफ से विज्ञान मंच के बैनर तले कम लागत के विज्ञान प्रयोगों का कार्नर लगाया गया इसके अलावा चमत्कारों का पर्दाफाश, विज्ञान मंच के प्रकाशनों का स्टाल व विशेष आमंत्रण पर पधारे प्रगति विज्ञान संस्था के श्री दीपक शर्मा व रोहणी गोले ने भी पृथ्वी की परिधि और हाइड्रोराकेट्री के माडलों का प्रदर्शन किया। समारोह के दौरान विज्ञान पेंटिंग प्रतियोगिता, विज्ञान माडल प्रदर्शनी, सेमिनार, रोबोटिक मुकाबलों का भी आयोजन किया गया।
कम लागत के विज्ञान प्रयोग
इन सब कार्यक्रमों के अलावा आयोजन विश्वविद्यालय मे होबी प्रदर्शनी का भी आयोजन किया गया था जहां पर विवि के छात्र छात्राओं द्वारा अपनी विभिन्न हाबिज़ को प्रकट करती प्रदर्शनी लगाईं हुई थी जिसमे २-२ छात्र छात्राओं ने Coin Collection सिक्के के संग्रह को प्रदर्शित किया हुआ था। उन्होंने विभिन्न देशों के व भारतीय प्राचीन व आधुनिक सिक्कों का संग्रह प्रदर्शित किया हुआ था जो कि काफी सराहा गया।हरियाणा विज्ञान मंच से सतबीर नागल, दीपा कुमारी, वेदप्रिय, ब्रह्मदेव, दर्शन लाल, अजय कुमार व प्रगति विज्ञान संस्था मेरठ से दीपक शर्मा व रोहिणी गोले ने शिरकत की व अपने हुनर से बालकों मे विज्ञान संचार  किया व वैज्ञानिक सोच उत्पन्न करने मे सम्मिलित प्रयासों को बढ़ावा दिया।
 चमत्कारों का पर्दाफाश
रामन  का नोबल पुरस्कार प्राप्त करना भारत की शान था          
कईं सदियों तक विदेशी आक्रमणकारियों और शासकों द्वारा दी गयी  गुलामी से प्रभावित रहा भारत देश का वासी जो कि प्राचीन काल मे विज्ञान और गणित का जन्मदाता व अग्रणी रहा था, उस दिन गर्वित अनुभव कर रहा था जब 28 फ़रवरी 1928  को ‘रामन प्रभाव’ की खोज हुई थी। इसी खोज के लिए वैज्ञानिक सी वी रमन वर्ष उन्नीस सौ तीस मे भौतिकी के प्रतिष्ठित नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किये गये थे। ब्रिटिश शासित देश के लिए यह और भी बड़े सम्मान की बात थी कि उनसे पहले उस समय तक एशिया मे भी किसी वैज्ञानिक को भौतिकी मे नोबल पुरस्कार नहीं मिला था। आज स्थानीय सरोजिनी कालोनी मे सी वी रमण विज्ञान क्लब के सदस्यों ने राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की पूर्व संध्या पर एक बैठक का आयोजन किया गया और मौजूदा दौर मे भारत मे वैज्ञानिक तरक्की और प्रतिभा पलायन पर रोक विषय  पर चर्चा की गयी।
 पृथ्वी की परिधि और हाइड्रोराकेट्री
कब मनाया जाता है राष्ट्रीय विज्ञान दिवस ?
1928 को सर सी वी रमन ने अपनी खोज की घोषणा की थी उसी यादगार दिन को मानाने के उद्देश्य वर्ष 1986 में विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार राष्ट्रीय परिषद के परामर्श पर भारत सरकार ने प्रत्येक वर्ष 28 फरवरी को राष्ट्रीय विज्ञान दिवस मनाने की घोषणा की थी। इस वर्ष राष्ट्रीय विज्ञान दिवस की थीम ‘वैज्ञानिक सोच को बढ़ावा’ रखा गया है। जिसके अंतर्गत विद्यार्थियों को विज्ञान के प्रति आकर्षित करना व उनमे और जनमानस मे वैज्ञानिक नजरिया व सोच उत्पन्न करने प्रति उत्साह का संचार करना है।

राकेट लौन्चिंग 
क्या है रमन प्रभाव ?
रामन प्रभाव के बारे मे विज्ञान अध्यापक दर्शन बवेजा ने बताया कि रामन प्रभाव मे यह होता है कि मोनोक्रोमेटिक प्रकाश किरण जब ठोस, द्रव या गैस के पारदर्शक माध्यम से गुजारी गयी और तब इसके विचलन अध्ययन करने पर पता चला कि मूल प्रकाश की किरणों के अलावा भी स्थिर अंतर पर कुछ बहुत क्षीण  तीव्रता की किरणे भी उपस्थित होती हैं। इन किरणों को रमन-किरणे नाम दिया गया। ये किरणे माध्यम के पार्टिकल्स के घूर्णन व कंपन के कारण मूल प्रकाश मे से ऊर्जा में घटत या बढ़त होने से उत्पन्न होती हैं। और इस खोज को रामन इफेक्ट नाम दिया गया रसायन, भौतिकी, वनस्पति विज्ञान, जंतु विज्ञान, भूगर्भ विज्ञान, और कम्युनिकेशन के क्षेत्र मे अन्य खोजों और आविष्कारों मे सहायता मिली। इस खोज के इतने   वर्षों बाद भी  ‘रामन इफेक्ट’  दुनिया भर की आधुनिक प्रयोगशालाओं में ठोस,  द्रव और गैसों के अध्ययन के लिए उपयोग किया जा रहा है
रोबोटिक मुकाबलों का नजारा 
कैसे उत्पन्न  हो वैज्ञानिक सोच? 
भारत जैसे विविधिता परिपूर्ण देश मे जहां का शिक्षा व रोजगार के अवसरों बटवारा समरूप नहीं है भागौलिक व सियासी विविधता परिपूर्ण देश मे विभिन्न धर्म व मतमतान्तरों के चलते अंधविश्वासों से दूर हट कर पूर्ण वैज्ञानिक सोच युक्त हो पाना बहुत कठिन था परन्तु हमारे वैज्ञानिकों और संचारकों ने सभी मर्यादाओं के अंतर्गत किसी को भी बिना ठेस पहुंचाए बहुत हद जनता को वैज्ञानिक सोच के नज़दीक ला दिया है परन्तु फिर भी कभी कभी देखने को मिलता है कि व्यवसायीकरण के इस दौर मे धार्मिक अंधविश्वास का प्रचार भी हावी हो जाता है परन्तु अब कोई भी अंधविश्वास अधिक दिनों तक नहीं जम पाता है और यही समाज मे वैज्ञानिक चेतना का विकास दर्शाता है।
इस अवसर पर विभिन्न  बच्चो ने निबंध लेखन, पेंटिंग, विज्ञान प्रश्नोत्तरी, विज्ञान सेमीनार और विज्ञान प्रदर्शनी आदि के माध्यम से अपनी क्षमता और और वैज्ञानिक प्रतिभा का प्रदर्शन किया।
                                                        रिपोर्ट: दर्शन लाल बवेजा 
अखबार मे : पंजाब केसरी