Saturday, November 15, 2014

यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने पुच्छल तारे पर उतारा स्पेसक्राफ्ट Rosetta mission’s

यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने पुच्छल तारे पर उतारा स्पेसक्राफ्ट Rosetta mission’s 
बहुत वर्षों से ये हसरत थी खगोल वैज्ञानिकों की कि पुच्छल तारे के वो अनखुले पन्ने भी खोले जाएं जिनको पढ़ कर ब्रह्मांड के उन रहस्यों को भी जाना जाए कि आखिर इन ग्रहों तारों का निर्माण किन किन चरणों मे हुआ है इसी जिज्ञासा वश पुच्छल तारे के नजदीक जाकर या फिर उसकी सतह पर पहुँच कर उस के बारे मे जाना जा सके इसी प्रयासों के फलस्वरूप यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने एक बहुत बड़ी कामयाबी के मुकाम को छुआ है और धूमकेतु को फतेह कर लिया है एजेंसी ने अंतरिक्ष में स्थित 67P नाम के धूमकेतु पर अपना लैंडर स्पेसक्राफ्ट उतार दिया अंतरिक्ष के अभियानों मे ऐसा ऐसा पहली बार हुआ है जब स्पेसक्राफ्ट को किसी धूमकेतु की सतह पर सुरक्षित उतारा गया है।
आज सी वी रमण विज्ञान क्लब यमुनानगर के सदस्यों को क्लब समन्वयक व दर्शन लाल बवेजा ने इसकी जानकारी दी। उन्होंने बताया कि दो मार्च 2004 को यूरोपियन स्पेस एजेंसी ने अपना हैरतअंगेज रोजेटा मिशन लॉन्च किया था तब इसे कल्पना मात्र माना जा रहा था। रोजेटा पूर्व दस  वर्षों मे पचास  करोड़ किलोमीटर से भी अधिक लंबा फासला तय करके 67P धूमकेतु के पास पहुंचा। जहां वैज्ञानिकों ने रोजेटा के संलग्नक लैंडर स्पेसक्राफ्ट फाइली को इस राकेट से अलग किया और इस से अलग होने के बाद फाइली ने सात घंटे की यात्रा की और धूमकेतु की सतह पर सुरक्षित लैंडिंग कर ली और जैसे ही लैंडिंग की सूचना मिली तो यूरोपियन स्पेस एजेंसी वैज्ञानिकों ने एक दूसरे को गले मिल कर बधाइयां दी। दर्शन लाल ने बच्चो को यह भी बताया कि यूरोपियन स्पेस एजेंसी के वैज्ञानिकों को फाइली से सिग्नल मिलने शुरू हो गए हैं पता चला है जिस पुच्छल तारे की सतह पर यह उतारा गया है उस की सतह बर्फीली है।
कितना बड़ा है 67P धूमकेतु
67P धूमकेतु जिस पर फाइली को लैंड करवाया गया है उसका आकार 4 किलोमीटर की चौड़ाई का है। जबकि लैंडर स्पेसक्राफ्ट फाइली का आकार एक कपड़े धोने की मशीन जितना है। यह पृथ्वी से इतनी दूर है कि इससे मेसेजिंग मे एक सन्देश के आने और जाने मे एक घंटे लगभग समय लगता है।
खगोल वैज्ञानिक क्या जानना चाहते है इस मिशन से?
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि मनुष्य की पहुँच से दूर इस खगोलीय पिंड के अध्ययन से सौरमंडल के बहुत से अज्ञात रहस्य पता लग सकते हैं। नेपच्यून ग्रह के पथ के बाहर विशाल धूमकेतुओं का एक बहुत विशाल झुरमुट है जिसे उर्ट क्लाउड कहते हैं। वहाँ से यदा-कदा इन धूमकेतुओं परिवार से कोई धूमकेतु सूर्य की प्रभावी गुरुत्व सीमा में आ जाता है और दीर्घवृत्तीय कक्षा में सूर्य की परिक्रमा करने लगता है। वैज्ञानिकों के एक बड़े वर्ग का यह भी मानना है कि भूतकाल मे पृथ्वी पर जीवन के लिए जरूरी कच्चा माल धूमकेतुओं से ही आयातित हुआ था। फ़्रेड होइल और कुछ खगोलविद ऐसा मानते आये हैं कि अब से कोई साढ़े छह करोड़ वर्ष पहले एक विशालकाय धूमकेतु के पृथ्वी से आ टकराने से विशालकाय प्राणी डायनासोर का सफाया हुआ था और वैज्ञानिकों का मानना है कि धूमकेतु के अध्ययन करने से सौर मंडल कैसे बना यानी इसके निर्माण की पहेली को सुलझाया जा सकता है सौरमंडल के अस्तित्व से आने लेकर अभी तक इनमें खास बदलाव नहीं हुआ है।


Saturday, October 25, 2014

राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस 22nd NCSC Tips

राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की तैयारियों की समीक्षा 22nd NCSC Tips

जिला स्तरीय राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस ग्यारह नवम्बर को विवेकानन्द पब्लिक स्कूल हुडा सेक्टर सत्रह जगाधरी मे होगी  
                
विद्यालयी बच्चो मे वैज्ञानिक दृष्टिकोण व खोजी प्रवृती उत्पन्न करने के उद्देश्य से विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी विभाग भारत सरकार द्वारा एन सी एस टी सी नेटवर्क, हरियाणा राज्य विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी विभाग व हरियाणा विज्ञान मंच रोहतक के सयुंक्त तत्त्वाधान द्वारा हर वर्ष राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस का आयोजन जिला, राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर करवाया जाता है जिस मे स्कूली बच्चे टीम बना कर दिए गए उपविषय पर सर्वे, केस स्टडी या प्रयोगात्मक विधियों से परियोजना बनाते हैं। इससे सम्बंधित बनाये गए परियोजनाओं को प्रस्तुति पूर्व निरीक्षण हेतु आज बच्चे विवेकानन्द पब्लिक स्कूल हुडा सेक्टर सत्रह जगाधरी मे एकत्र हुए जहां उन्होंने अपने परियोजना कार्यों को जिला समन्वयक दर्शन लाल और प्रवक्ता ज्योतिका डांग के समक्ष प्रस्तुत किया। आयोजन पूर्व इस निरीक्षण कार्यक्रम मे बच्चो को उनके विज्ञान प्रोजेक्ट्स मे सुधार व उनको और बेहतर बनाने के टिप्स दिए गए।
बच्चो द्वारा तैयार किये जा रहे विज्ञान प्रोजेक्ट  
बच्चो ने ठोस कचरा प्रबंधन और मौसम, 
मेरी अपनी मौसम प्रयोगशाला, 
मौसम परिवर्तन के  दौरान स्कूल मे विद्यार्थियों की उपस्थिति पर प्रभाव, 
मौसम परिवर्तन का त्वचा पर प्रभाव, 
सेक्टर सत्रह मे प्रवासीयो के जीवन मे मौसम व जलवायु मे परिवर्तन के प्रभाव, यातायात नियंत्रण पर मौसम का असर, 
सरोजनी कालोनी व आसपास रह रहे अन्य प्रदेशो के परिवारों का स्थानीय मौसम के साथ तालमेल व प्रभाव का अध्ययन, 
मानसून के दौरान नहर तटीय क्षेत्रों मे जलस्तर बढ़ने से होता आर्थिक नुकसान व निवारण के उपाय, 
झुग्गी बस्ती मे मौसम से बचाव के त्रिकोण का अध्ययन व सेहत पर प्रभाव, 
बदलते मौसम मे खानपान के बदलाव का सेहत व आर्थिक दशा पर प्रभाव, 
बदलते मौसम के प्रभाव से पालतू पशुओं के बचाव के देसी तरीको का अध्ययन व सुझाव, 
स्थानीय क्षेत्र मे मौसम की मार और वनस्पतियों पर प्रभाव, 
विद्यालय भवन पर मौसम परिवर्तन का प्रभाव और मुरम्मत पर वार्षिक खर्च का आंकलन व सुझाव,
स्थानीय कृषी पर वर्षा का प्रभाव व बदलाव की सम्भावना, 
दूध के उत्पादन पर मौसम का प्रभाव, 
गावं के तालाबो का जलस्तर-मानसून पूर्व व मानसून पश्चात, 
मौसम मुताबिक़ पक्षियों के व्यवहार मे परिवर्तन का अध्ययन, 
वर्षा को मापना, 
वर्तमान और भविष्य मे हुई वर्षा का तुलनात्मक अध्ययन समेत बहुत से प्रोजेक्ट पर चर्चा की गयी।
इस बार की जिला स्तरीय राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस ग्यारह नवम्बर को विवेकानन्द पब्लिक स्कूल हुडा सेक्टर सत्रह जगाधरी मे होगी। विद्यालय की प्रधानाचार्य अनीता काम्बोज व विज्ञान अध्यापक विकास पुंडीर ने इस आयोजन को लेकर बहुत उत्साह व खुशी व्यक्त की है।
जिला के भावी बाल वैज्ञानिकों केशरी, विश्वास, मेहुल, तन्वी, गर्वित, आकाश, अभिशान, पारखी, आयुष, यशस्वी, श्रुति, फिज़ा, शोभित, अर्जुन, निकुंज, हर्ष, लव, शुभम, रिया, अमीषा, साहिल, ध्रुव, अक्षित, उमंग, मयंक ने पाने विज्ञान प्रोजेक्ट्स प्रस्तुत किये व इनके साथ उनके मार्गदर्शक अध्यापक विकास पुंडीर, ज्योतिका डांग, गौरव, रीना व सुबुही  ने भी प्रोजेक्ट्स का जायजा लिया व सुझाव दिए ताकि बच्चे मुख्य प्रतियोगिता तक अपने प्रोजेक्ट्स को और बेहतर बना सकें।         




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Friday, October 10, 2014

जीपीएस सैटेलाइट नेविगेशन विश्व अंतरिक्ष सप्ताह World Space Week GPS Location

जीपीएस सैटेलाइट नेविगेशन व पेंटिंग प्रतियोगिता विश्व अंतरिक्ष सप्ताह World Space Week GPS Location
जीपीएस सैटेलाइट नेविगेशन से अपनी अक्षांशीय व देशांतर स्थिति ज्ञात करना सीखा

विश्व अंतरिक्ष सप्ताह, प्रत्येक वर्ष विश्व अंतरिक्ष सप्ताह संगठन और संयुक्त राष्ट्र के बाह्य अंतरिक्ष मामलों के विभाग के सयुंक्त तत्वाधान में पूरी दुनिया के 80 देशो में एक साथ चार अक्टूबर से दस अक्टूबर तक मनाया जाता है। 4 अक्टूबर 1957 को पहला मानव निर्मित उपग्रह स्पुतनिक प्रथम अंतरिक्ष में भेजा गया था। इस दिन मनुष्य की अंतरिक्ष मे प्रवेश की अभिलाषा पूरी हुई थी इसलिए इस दिन की याद को स्मरण करने के उदेश्य से विश्व अंतरिक्ष सप्ताह मनाया जाता है।
इस वर्ष 2014 के लिए विश्व अंतरिक्ष सप्ताह की थीम ‘अंतरिक्ष: आपका पथप्रदर्शक’ रखी गयी है। इस वर्ष यह थीम पृथ्वी ग्रह पर मानव की बेहतरी मे उपग्रहीय उपयोगिता को समर्पित है इस थीम उपग्रहों द्वारा मानव जीवन में सुधार की सम्भावनाओं की तलाश के मद्देनजर चुना गया है। 
पृथ्वी ग्रह पर मानव और पर्यावरण के हित और सुरक्षा के लिए अंतरिक्ष विज्ञान के प्रयोग और सम्बन्धित जानकारियों को विद्यार्थियों और आमजन तक पहुंचाने के उद्देश्य से सी वी रमण विज्ञान क्लब यमुनानगर व हरियाणा विज्ञान मंच यमुनानगर इकाई के सदस्यों ने जीपीएस लोकेशन प्रणाली के द्वारा अपनी अक्षांशीय व देशांतर पोजिशन ज्ञात करना सीखा, इसी कड़ी मे सी वी रमण विज्ञान क्लब के सदस्यों ने अपने क्लब समन्वयक दर्शन लाल बवेजा के मार्गदर्शन मे इंटरनेट व मोबाइल एप्लीकेशन के जरिये यमुनानगर के विभिन्न स्थानों पर अपनी अक्षांशीय व देशांतर पोजिशन ज्ञात करके एक लोकेशन चार्ट बनाया और इस गतिविधि के जरीय वे अंतर्राष्ट्रीय प्रतियगिता के हिस्सा बने।
दर्शन लाल ने बताया कि जीपीएस एक ऐसी प्रणाली है जो अंतरिक्ष में सैटेलाइट नेविगेशन के जरिए किसी भी प्रकार के मौसम में किसी की भी लोकेशन की जानकारी देता है। यह प्रणाली अंतरिक्ष मे स्थापित मात्र कुछ सैटेलाइटस के द्वारा मात्र 20 मीटर के रेंज में नेविगेशन की सुविधा प्रदान करती है परन्तु अंतरिक्ष वैज्ञानिक इस दूरी को घटा कर 15 मीटर रेंज में भी यह सुविधा प्रदान करने के लिए प्रयासरत हैं। जीपीएस तकनीक उपग्रहों द्वारा भेजे गए संदेशो पर काम करती है। मोबाइल में जीपीएस तकनीक के प्रयोग द्वारा प्रयोक्ता अपनी स्थिती का आसानी से पता लगा सकता है मान लीजिए आप जगाधरी रेलवे स्टेशन पर हैं और आपको जगाधरी बस स्टैंड जाना है तो आप जगाधरी बस स्टैंड का रास्ता जीपीएस तकनीक की मदद से आसानी से पता लगा सकते है। जीपीएस डिवाइस उपग्रह से प्राप्तए सिंगनल द्वारा उस जगह को नक्शे में दशार्ती रहती है। जीपीएस का प्रयोग ट्रैनों, जहाजों की स्थिती, जमीन का सर्वेक्षण करने, वाणिज्यिक कार्य, वैज्ञानिक प्रयोग, और सेना में काफी समय से किया जाता रहा है।
इस गतिविधि मे सोनाक्षी, सुमेधा गल्होत्रा, आंचल काम्बोज, अमन, पारस बतरा, पलक, पार्थवी, प्रमाद ने भाग लिया लोकेशन चार्ट बनाया।
सैटेलाइट हमारा पथप्रदर्शक विषय पर चित्रकारी प्रतियोगिता आयोजित
विश्व अंतरिक्ष सप्ताह 2014 की थीम ‘अंतरिक्ष: आपका पथप्रदर्शक’ थीम के अंतर्गत आज सरोजिनी कालोनी के अर्जुन पार्क मे हरियाणा विज्ञान मंच और सी वी रमन विज्ञान क्लब के सदस्यों ने ‘अंतरिक्ष मे सैटेलाइट है हमारा पथप्रदर्शक’ विषय पर चित्रकारी प्रतियोगिता मे भाग लिया और उपग्रह प्रणाली को दर्शाते सुंदर सुंदर चित्र बनाए। यमुनानगर के विभिन्न स्कूलों के बच्चो ने आज छुट्टी के दिन का बेहतर प्रयोग करते हुए क्लब द्वारा आयोजित इस पेंटिंग प्रतियोगिता मे भाग लेकर विश्व अंतरिक्ष सप्ताह मनाया और ८० देशों के बच्चो के साथ मिल इस इवेंट के प्रतिभागी बने।
हरियाणा विज्ञान मंच के जिला समन्वयक दर्शन बवेजा ने बताया कि इस प्रतियोगिता मे आंचल, वंशिका, सुमेधा, सुशांत, अमन, पार्थवी, अवनी, काजल, पारस, पलक, अर्श सैनी, मनप्रीत, शिवम, सुदक्ष, सुकृत, वंश, स्पर्श, विनय, सजल, सुप्रीत, अभिमन्यु, छवि आदि ने भाग लिया। पलक बतरा ने अपनी पेंटिंग मे दर्शाया कि किस प्रकार अंतरिक्ष विज्ञान का प्रयोग करके हम आने वाले आंधी तूफ़ान और चक्रवात का पहले से ही पता लगा लेते हैं और इस तकनीक का प्रयोग करके आपदा पूर्व चेतावनी जारी करके मानव को जान माल की क्षति से बचाया जा सकता है और पेंटिंग के माध्यम से यह भी बताया गया कि वास्तव मे अंतरिक्ष मे छोड़े गए मौसम मानीटरन व सुदूर सवेंदन के उपग्रह मानवो के लिए विज्ञान का वरदान साबित हुए हैं जिसने मानव जीवन को आसान और सुखमय बना दिया है। 

एक अन्य पेंटिंग मे प्रतिभागी वंशिका ने कल्पना की है कि भारत ने मंगल ग्रह पर अपने उपग्रहों की मदद से विजय पा ली है और अपना मानव मिशन कामयाबी पूर्वक मंगल पर भेज कर भारतीयों ने विश्व मे अपनी अंतरिक्ष विज्ञान की योग्यता को सिद्ध किया है। पार्थवी ने अपनी पेंटिंग मे कल्पना की है कि जब मनुष्य आने वाले समय मे अंतरिक्ष मे आसानी से यात्राएं करने लगेगा तब वो पराग्रहियों की खोज करके उनसे मित्रता करेगी व उनके ग्रह पर जायेगी।
विश्व अंतरिक्ष सप्ताह के भारतीय राष्ट्रीय सयोंजक श्री चन्दर देवगन ने बच्चों को विश्व अंतरिक्ष सप्ताह की अंतर्राष्ट्रीय गतिविधियों मे भाग लेकर देश का नाम रोशन करने के लिए बधाइयां और शुभकामनाएं दी हैं।

अख़बारों मे 



                             




Tuesday, September 30, 2014

राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला Teachers Training Workshop NCSC

राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला Teachers Training Workshop of NCSC
राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस की शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला सम्पन्न हुई

विद्यालयी बच्चो मे वैज्ञानिक दृष्टिकोण व खोजी प्रवृती उत्पन्न करने के उद्देश्य से विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी विभाग भारत सरकार द्वारा एन सी एस टी सी नेटवर्क, हरियाणा राज्य विज्ञान एवं प्रोद्योगिकी विभाग व हरियाणा विज्ञान मंच रोहतक के सयुंक्त तत्त्वाधान द्वारा हर वर्ष राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस का आयोजन जिला, राज्य व राष्ट्रीय स्तर पर करवाया जाता है 
जिस मे स्कूली बच्चे टीम बना कर दिए गए उपविषय पर सर्वे, केस स्टडी या प्रयोगात्मक विधियों से परियोजना बनाते हैं और फिर उस प्रोजेक्ट को जिला स्तरीय विज्ञान कांग्रेस प्रतियोगिता मे प्रस्तुत किया जाता है जहां वो अपने कार्यों को निर्णयको और दर्शको से समक्ष रखते हैं व समस्या निवारण के वैज्ञानिक तरीको व भविष्य की योजनाओ को प्रकट करते हैं और जिला स्तर पर चयनित होने पर अपने शोध पत्र को राज्य स्तरीय प्रतियोगिता मे प्रस्तुत करते हैं।
जिला साइंस कोर कमेटी के शैक्षिक समन्वयक जरनैल सिंह सांगवान व जिला समन्वयक दर्शन लाल बवेजा ने जिले के अध्यापको को अध्यापक प्रशिक्षण कार्यशाला मे भाग लेने के लिए जिला शिक्षा अधिकारी के माध्यम से बुलाया है जहां अध्यापको को राष्ट्रीय बाल विज्ञान सम्मेलन मे बच्चों को प्रोजेक्ट तैयार करवाने का प्रशिक्षण दिया गया।
इससे सम्बंधित अध्यापक प्रशिक्षण कार्यशाला स्थानीय मुकंद लाल पब्लिक स्कूल सरोजिनी कालोनी मे सम्पन्न हुई जिस मे विभिन्न संस्थानों से आमंत्रित रिसोर्स पर्सन्स ने जिले निजी व राजकीय स्कूलों से आये अध्यापक प्राध्यापकों को  विज्ञान प्रोजेक्ट बनाने के लिए प्रशिक्षित किया। 
विद्यालय की प्रधानाचार्या शशि बाटला ने उपस्थित अध्यापको को बताया कि विज्ञान शिक्षा मे परियोजना कार्य का बहुत महत्त्व है और अध्यापको को अपने विद्यार्थियों को अधिक से अधिक साइंस प्रोजेक्ट करवाने चाहियें ताकि उनमे विज्ञान विषय की बेहतर समझ बन सके।
इस प्रशिक्षण कार्यशाला मे खालसा कालेज के पर्यावरण विभाग से दलबीर कौर, रसायन प्रवक्ता सुमन शर्मा, जेएस सांगवान, डाक्टर विजय त्यागी, गीता मल्होत्रा, ममता वर्मा, सीमा कटारिया, प्रोफेसर के सी ठाकुर, दर्शन बवेजा ने उपस्थित अध्यापको को प्रशिक्षित किया।
जिला विज्ञान विशेषज्ञ डाक्टर विजय त्यागी ने परियोजना शोधपत्रों मे सरलता और वास्तविकता पूर्ण तथ्यों को शामिल  करने पर बल दिया व इन परियोजनाओं को जीवन से सम्बन्धित करके उपचारात्मक उपाय बताने पर फोकस किया। 
श्री गुरुनानक खालसा कालेज के पर्यावरण विभाग से दलबीर कौर ने  अध्यापको को बताया कि हम अपनी जीवन शैली मे थोड़ा सा परिवर्तन करके पर्यावरण को बहुंच रहे बड़े बड़े खतरो से बचा सकते हैं वास्तव मे मनुष्य ही अपनी गतिविधियों से पृथ्वी के मौसम व जलवायु मे परिवर्तनों के लिए जिम्मेदार है और जिसका कि खामियाजा वह प्राकृतिक आपदाओं के रूप मे झेल रहें है। 

हरियाणा विज्ञान मंच के जिला शैक्षिक समन्वयक जरनैल सिंह सांगवान ने बताया कि विज्ञान संचार को मात्र विद्यार्थियों तक ही नहीं बल्कि जन जन तक पहुंचाना होगा ताकि अंधविश्वासो से मुक्ति पाकर मानव जाति उन्नति कर सके।
रसायन प्रवक्ता सुमन शर्मा ने मौसम और जलवायु मे बदलाव को विस्तार से समझाया और अपने आसपास के पर्यावरण को समझने के लिए व उन सूक्ष्म बदलावों को अपनी परियोजनाओं का विषय बनाने पर बल दिया। इस वर्ष के विज्ञान कांग्रेस  के मुख्य विषय  ‘‘मौसम और जलवायु की समझ’’ पर प्रशिक्षित करेंगे।
जिला समन्वयक दर्शन लाल ने अध्यापको को परियोजना रिपोर्ट लिखने व कार्य प्रणाली सम्बन्धित प्रशिक्षण दिया। उन्होंने ने बताया कि इस वर्ष बच्चे मानवीय गतिविधियों द्वारा मौसम एवं जलवायु पर प्रभाव, अपने आसपास के मौसम की पहचान, मौसम, जलवायु एवं परितंत्र, मौसम, जलवायु, समाज और संस्कृति, मौसम, जलवायु और कृषि तथा मौसम, जलवायु और स्वास्थ्य जैसे छह उपविषयों पर दस से सत्रह आयुवर्ग के बच्चे जूनियर और सीनियर वर्ग में बाल विज्ञान काँग्रेस में अपने रिसर्च प्रोजेक्ट प्रस्तुत कर सकेंगे। इस बार बच्चे मौसम और जलवायु से संबंधित प्रोजेक्ट बनाकर अपनी वैज्ञानिक समझ का परिचय देंगे और लघु शोध पत्र प्रस्तुत कर सीधे राज्य स्तरीय आयोजन के लिए चयनित किये जाएंगें। शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला के तहत शिक्षकों को विषय से संबंधित जानकारी उपलब्ध कराई गयी है, ताकि जिले से बेहतर प्रोजेक्ट प्रस्तुतिकरण हो सके। 
प्रोफेसर के सी ठाकुर व प्रवक्ता गीता मल्होत्रा ने जलवायु और मौसम का मानव और अन्य जीवो पर प्रभाव उपविषय पर प्रशिक्षित किया। उन्होंने यमुनानगर जिले के गौरवपूर्ण विज्ञान कांग्रेस के इतिहास पर प्रकास डाला और अध्यापको को प्रेरित किया व अध्यापको मे भी विश्वास दिलाया कि वे बहुत उत्साह से इस कार्यक्रम मे भाग लेंगे और जिले का नाम विज्ञान के क्षेत्र मे रोशन करेंगे   

शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला मे 72 अध्यापकों ने भाग लिया व जिला स्तरीय बाल विज्ञान कांग्रेस अक्टूबर के अंतिम सप्ताह मे सम्पन्न होगी। 

स अवसर पर स्कूल के भावी बाल वैज्ञानिकों ने मेरी अपनी मौसम प्रयोगशाला शीर्षक के अंतर्गत एक प्रदर्शनी भी लगाई जिसको प्रधानाचार्या, जिला विज्ञान विशेषज्ञ व उपस्थित प्रशिक्षुओं ने देखा और सराहा भी ज्ञात रहे ये बच्चे इस विषय पर अपनी परियोजना भी बना रहे हैं।
आज की इस शिक्षक प्रशिक्षण कार्यशाला मे जिला भर से सिल्की चड्ढा, सुमन लता, राजीव नंदा, अलका रानी, संजीत कुमार, रविंदर कुमार, इंदु अरोड़ा, इक्षा धरुपद त्यागी, रितेश पाल, अवनीश कुमार, कमाल शर्मा, सोनिया विज, कोमल चड्ढा, श्वेता चौधरी, सुमन, स्मृति शर्मा, सोमेश राजन, राजेश मेंरॉय, रेनू देवी, ओमप्रकाश, मनीषा भट्टी, ममता रानी, तरुण कुमार, डाक्टर अनुराधा धीमान, सतबीर सिंह, रंजना गुलाटी, प्रीती जैन, प्रीटी जैन, ए. सीता, हिमानी शर्मा, ज्योतिका डांग, रीना मल्होत्रा, गौरव कुमार, मुक्ता भाटिया, मंजू आर्या, रजनी पुंडीर, गीता मल्होत्रा, डाक्टर बी. के. रीन, मनीषा खेत्रपाल, वनीता गोयल, श्रीश कुमार, अजमेर शिंह संधू, मधु मेहता, सरिता, ज्योति गर्ग, रश्मी गुप्ता, पूजा, मनोज कुमार, ज्योति, विनोद, राजेन्द्र झाम्ब, दीपिका भाटला, ब्रह्म सिंह सहित अन्य अध्यापको, टीजीटी व प्राध्यापकों ने भी भाग लिया           



Monday, September 29, 2014

National Children’s Science Congress NCSC

History of NCSC
National Children’s Science Congress NCSC
Post-independence India has seen quite a few marvelous science & technology interventions for emancipation of peoples’ life in all its facets. Scanning through the truly national efforts in the last couple of decades, one event that readily comes to mind is National Children’s Science Congress (NCSC), which not only has changed the way we look at science; but also has ignited the minds of Indian children, because it directly involves these budding citizens of our vast country. But the best part of this movement is the involvement of the adults too; be it as motivators and guides, or organizers and facilitators. Such an amalgamation of diverse people and thoughts has truly made National Children’s Science Congress an extremely popular and desirable activity in the Indian scientific calendar.
The Philosophy of NCSC
·         A unique program that motivates children to take-up scientific research on local specific issues of their choice under broad themes, instead of imposing issues on them.
·         A real experiment to promote ‘methods of science’ with ample opportunities to encourage creativity, innovation and experiential learning (learning by doing).
·         An activity towards promoting spirit of team work, correlating science with everyday life situations.
·         A potentially strong and effective movement for influencing the impressionable minds to enhance community feelings and sensitize towards societal needs.
·         An event not merely for the privileged and school-going children; but even for those who are not in the formal school set-up, drop-outs, or forced to be out of the conventional mode due to poverty and disabilities.

The Genesis
The National Children’s Science Congress (NCSC) began as an experiment in Gwalior, Madhya Pradesh in the early nineties, involving children in open-ended scientific projects of relevance to the society. It became a nationwide activity since 1993. The Congress is organized by NCSTC-Network, a registered society.
The Process of NCSC
·         In a brain storming session with all likeminded organizations & individuals associated with NCSC declare a Focal Theme, with relevant sub-themes, for every two years.
·         Necessary Activity Guide, leaflets, application forms are circulated well on time through the State and District coordinating agencies.
·         District level organizing committees and academic committees are responsible for disseminating the message and software to the children spread over the length and breadth of the country.
·         Children form groups of 2—5, and select a guide to steer them through the project. They first identify a topic/ an issue/ a local problem under the given sub-themes and make quick assessment of the work schedule. Projects build up on models, prototypes or hypotheses which might be very refreshing and innovative; some of them based on surveys conducted by children.
·         Working through surveys, collection of data, collation of data, drawing results, representing findings by suitable mathematical tools, suggesting solutions, testing results in the field, concluding with follow-up actions in that order, the groups prepare the project reports in a standard and uniform manner.
·         The report is presented first in the District Level Congress by the group leader and is assessed by a group of evaluators. All selected projects from this level are next presented in the State Level Congress in front of a wider audience and discussed threadbare by all concerned before they are sent for the grand finale National Level Congress, held during 27—31 December every year. Seven to eight lakh Young Scientists participate at various levels from the states & union territories. Two-three best projects from each state also participate in the annual session of Science Congress organized by Indian Science Congress Association, every year during January 3rd – 7th.

The Main Objectives of NCSC
The primary objectives of the National Children’s Science Congress is to make a forum available to children of the age-group of 10-17 years, both from formal school system as well as from out of school, to exhibit their creativity and innovativeness and more particularly their ability to solve a societal problem experienced locally using the method-of-science. By implication, the CSC prompts children to think of some significant societal problem,
ponder over its causes and subsequently try and solve the same using the scientific process. This involves close and keen observation, raising pertinent questions, building models, predicting solutions on the basis of a model, trying out various possible alternatives and arriving at an optimum solution using experimentation, field work, research and innovative ideas. The Children’s Science Congress encourages a sense of discovery. It emboldens the participants to question many aspects of our progress and development and express their findings in vernacular.
Features of the Congress
1. Innovative, simple and practical.
2. Represent teamwork.
3. Are based on exploration of everyday life-situations.
4. Involve field based data collection.
5. Have definite outputs, arrived through scientific methodology.
6. Are related directly to community work in the local community.
7. Have definite follow-up plans.


Who are eligible to participate?
·         Any children within the age bracket of 10 and 17 years can participate in NCSC, irrespective of caste, creed, religion, language and ethnic background.
·         10 to 14 years constitutes the lower age group; while 14+ to 17 years is called the upper age group. The age is calculated on the basis of attainment on 31 December of the calendar year.
·         NCSC is not necessarily a school-based program; it is open to all non formal systems of education besides out-of-school and disabled children.
·         Children in the past have joined CSC from science centers, clubs and other forums also, although they are also part of school systems. In which Area One Should Do the
Research/Project? Every year a focal theme is announced for the NCSC. The children are expected to carry out projects related to the focal theme and the identified subthemes. Activity guide books are available to help guide teachers and the scientists. A group of children not exceeding five can do the project with the help of scientists, school science teachers, coordinators of school science clubs, activists of science based voluntary organizations, etc. The teachers/guides receive special orientation on the theme of the NCSC every year.

Following are the Focal Themes of the past years and Venue place
1993 – Know your Environment (Delhi)
1994 & 1995 – Clean up India (Delhi & Guwahati)
1996 & 1997 – India of our dreams – Let’s go for it (Hyderbad & Bhopal)
1998 & 1999 – Nature – Let’s conserve, share & Care (Chennai & Goa)
2000 & 2001 – Indigenous scientific knowledge for a better tomorrow (Kolkata & Pune)
2002 & 2003 – Food systems towards nutrition for all (Mysore & Lucknow)
2004 & 2005 – Harness water resources for better future (Guwahati & Bhubaneshwar)
2006 & 2007 – “Biodiversity’: Nurture Nature for our Future” (Sikkim & Baramati)
2008 – 2009 – “Planet Earth: Let’s Explore, Care & Share.” (Dimapur & Ahmadabad)
2010 & 2011 – Land Resources: use for Prosperity & Save for Posterity (Chennai & Jaipur)
2012 & 2013 – Energy-Explore, Harness and Conserve (Varanasi & Bhopal)
The Evaluation Process of NCSC Projects
Screening of projects are done by the evaluators at District and State
Level Congresses on the basis of oral presentation, project report and aids used during presenting the report. Innovativeness, methodology, amount of work, impact of the project out come and teamwork form the basis of evaluation.
Evaluation Criteria of NCSC Projects
1. Originality & relevance of the project idea
2. Presentation
3. Scientific understanding of the issue
4. Data collection & analysis
5. Experimentation/Scientific study/validation
6. Problem solving attempt (for district level NCSC only)
7. Problem solving attempt & follow up (for state & national level CSCs)
8. Team work
9. Background correction (for district level CSC only)
10. Improvement from the previous level (for State & National level only)
The best potential projects are further screened at national event by a team of evaluators. Short listed potential projects & Children involved with those projects will be given the opportunity to pursue their study in some of the designated laboratories for a specific period. About 8 – 9 lakhs children participate every year in CSC starting from district level since 1993. It welcomes international participation and sharing of experience. It has records of international participation from countries like Germany, Srilanka, Bangladesh and ASEAN Countries. This year the National Event of 2014 is to be during 27th – 31st December 2014.

NCSC 2014-2015 Announced 
Focal Theme:Understanding Weather & Climate
  Need to have proper understanding of weather and climate and its changes, mainly oriented towards different aspects, factors, and attributes of weather and climate along with their implications on the natural ecosystem and on the way of life of living beings.
  At the same time, focus on climate change aspects, including mitigation and adaptation are also to be studied.

Sub themes:
  1. Understanding Weather (& Climate) around You.
  2. Impact of Human Activities on Weather and Climate
  3. Weather, Climate and Ecosystems
  4. Weather, Climate - Society and Culture
  5. Weather, Climate and Agriculture
  6. Weather, Climate and Health